1- बृंदावन क्यों न भए हम मोर।
करत निवास गोबरधन ऊपर, निरखत नंद किशोर।
क्यों न भये बंसी कुल सजनी, अधर पीवत घनघोर।
क्यों न भए गुंजा बन बेली, रहत स्याम जू की ओर॥
क्यों न भए मकराकृत कुण्डल, स्याम श्रवण झकझोर।
‘परमानंद दास’ को ठाकुर, गोपिन के चितचोर॥
2-कौन रसिक है इन बातन कौ।
नंद-नंदन बिन कासों कहिये, सुन री सखी मेरो दु:ख या मन कौ।
कहँ वह जमुना पुलिन मनोहर, कहँ वह चंद सरद रातिन कौ।
कहँ वह मँद सुगंध अमल रस, कहँ वह षटपद जलजातन कौ।
कहँ वह सेज पौढिबो बन को, फूल बिछौना मदु पातन कौ।
कहँ वह दरस परस ‘परमानंद’ कोमल तन कोमल गातन कौ॥
3-
ब्रज के बिरही लोग बिचारे।
बिन गोपाल ठगे से ठाढे अति दुरबल तन हारे॥ मात जसोदा पंथ निहारत निरखत साँझ सकारे। जो कोइ कान्ह-काह कहि बोलत ऍंखियन बहत पनारे॥ यह मथुरा काजर की रेखा जे निकसे ते कारे। ‘परमानंद’ स्वामि बिनु ऐसे ज्यों चंदा बिनु तारे॥
4-मैया मोहिं ऐसी दुलहिन भावै।
का गोप की तनक ढोठिनियाँ,रुनक झुनक चलि आवै॥
कर-कर पाक रसाल आपने कर मोहिं परसि जिमावै।
कर अंचर पट ओट बबातें, ठाढी ब्यार ढुरावै॥
मोहिं उठाय गोद बैठारै, करि मनुहार मनावै।
अहो मेरे लाल कहो बाबा तें, तेरो ब्याह करावै।
नंदराय नंदरानी देउ मिलि, मोद समुद्र बढावै।
‘परमानंददास को ठाकुर, बेद विमल जस गावै॥
5- कहा करौ बैकुंठहि जाय?
जहाँ नहि नन्द जसोदा गोपी, जहाँ नहीं ग्वाल-बाल और गाय।
जहाँ न जल जमुना कौ निर्मल, और नहीं कदमनि की हाय।
‘परमानन्द’ प्रभुचतुर ग्वालिनी, बज-रज तजि मेरी जाइ बलाय।।
6-श्री लाल कछु कीजे भोजन तिल तिल कारी हों वारी हों।
अब जाय बैठो दोउ भैया नंदबाबा की थारी हो॥१॥
कहियत हे आज सक्रांति भलो दिन करि के सब भोग संवारी हो।
तिल ही के मोदक कीने अति कोमल मुदित कहत यशुमति महतारी॥२॥
सप्तधान को मिल्यो लाडिले पापर ओर तिलवरी न्यारी।
सरस मीठो नवनीत सद्य आज को तिल प्रकार कीने रुचिकारी॥३॥
बैठे श्याम जब जेमन लागे सखन संग दे दे तारी।
परमानंद दास तिहि औसर भरराखे यमुनोदक झारी॥४॥
7- पतंग की गुडी उडावन लागे व्रजबाल॥
सुंदर पताका बांधे मनमोहन बाजत मोरन के ताल॥१॥
कोउ पकरत कोउ खेंचत कोउ चंचल नयन विशाल।
कोउ नाचत कोउ करत कुलाहल कोउ बजावत बहोत करताल॥२॥
कोउ गुडीगुडीसो उरझावत आवत खेंचत दोरिरसाल।
परमानंद स्वामी मनमोहन रीझ रहेत एकही ताल॥३॥
8- यह मांगो गोपीजन वल्लभ ।
मानुस जन्म और हरि सेवा, ब्रज बसिबो दीजे मोही सुल्लभ ॥१॥
श्री वल्लभ कुल को हों चेरो,वल्लभ जन को दास कहाऊं ।
श्री जमुना जल नित प्रति न्हाऊं, मन वच कर्म कृष्ण रस गुन गाऊं ॥२॥
श्री भागवत श्रवन सुनो नित, इन तजि हित कहूं अनत ना लाऊं ।
‘परमानंद दास’ यह मांगत, नित निरखों कबहूं न अघाऊं ॥३॥
9- आज दधि मीठो मदन गोपाल ।
भावे मोही तुम्हारो झूठो, सुन्दर नयन विशाल ॥
बहुत दिवस हम रहे कुमुदवन, कृष्ण तिहारे साथ ।
एसो स्वाद हम कबहू न देख्यो सुन गोकुल के नाथ ॥
आन पत्र लगाए दोना, दीये सबहिन बाँट ।
जिन नही पायो सुन रे भैया, मेरी हथेली चाट ॥
आपुन हँसत हँसावत औरन, मानो लीला रूप ।
परमानंद प्रभु इन जानत हों, तुम त्रिभुवन के भूप॥
10- माई मीठे हरि जू के बोलना ।
पांय पैंजनी रुनझुन बाजे, आंगन आंगन डोलना ॥
काजर तिलक कंठ कचुलामल, पीतांबर को चोलना ।
‘परमानंद दास’ की जीवनी, गोपि झुलावत झोलना ॥
11- मंगल माधो नाम उचार।
मंगल वदन कमल कर मंगल मंगल जन की सदा संभार ॥१॥
देखत मंगल पूजत मंगल गावत मंगल चरित उदार ।
मंगल श्रवण कथा रस मंगल मंगल तनु वसुदेव कुमार ॥२॥
गोकुल मंगल मधुवन मंगल मंगल रुचि वृंदावन चंद ।
मंगल करत गोवर्धनधारी मंगल वेष यशोदा नंद॥३॥
मंगल धेनु रेणु भू मंगल मंगल मधुर बजावत बेन।
मंगल गोप वधू परिरंभण मंगल कालिंदी पय फेन ॥४॥
मंगल चरण कमल मुनि वंदित मंगल की रति जगत निवास ।
अनुदिन मंगल ध्यान धरत मुनि मंगल मति परमानंद दास ॥५॥
12- यह प्रसाद हों पाऊं श्री यमुना जी।
तिहारे निकट रहों निसिबासर राम कृष्ण गुण गाऊँ॥१॥
मज्जन करों विमल जल पावन चिंता कलह बहाऊं।
तिहारी कृपा तें भानु की तनया हरि पद प्रीत बढाऊं॥२॥
बिनती करों यही वर मांगो, अधमन संग बिसराऊं।
परमानंद प्रभु सब सुख दाता मदन गोपाल लडाऊं॥३॥
13- श्री जमुना जी दीन जानि मोहिं दीजे।
नंदकुमार सदा वर मांगों गोपिन की दासी मोहि कीजे ॥१॥
तुम तो परम उदार ख्रुपा निधे चरन सरन सुखकारी।
तिहारे बस सदा लाडिली वर तट क्रीडत गिरिधारी॥२॥
सब ब्रजजन विहरत संग मिलि अद्भुत रास विलासी ।
तुम्हारे पुलिन निकट कुंजने द्रुम कोमल ससी सुबासी ॥३॥
ज्यों मंडल में चंद बिराजत भरि भरि छिरकत नारी ।
हँसत न्हात अति रस भरि क्रीडत जल क्रीडा सुखकारी ॥४॥
रानी जू के मंदिर में नित उठि पाँय लागि भवन काज सब कीजे ।
परमानन्ददास दासी व्है नन्दनन्दन सुख दीजे ॥५॥
14- नन्द बधाई दीजे हो ग्वालन।
तुमारे स्याम मनोहर आये गोकुल के प्रतिपालन॥१॥
युवतिन बहु विधि भूषन दीजे विप्रन को गौदान।
गोकुल मंगल महा महोत्सव कमल नैन घनस्याम॥२॥
नाचत देव विमल गंधर्व मुनि गावे गीत रसाल।
परमानन्द प्रभु तुम चिरजीयो नंदगोप के लाल॥३॥
15 – चैत्र मास संवत्सर परिवा बरस प्रवेस भयो है आज।
कुंज महल बैठे पिय प्यारी लालन पहरे नौतन साज॥१॥
आपुही कुसुम हार गुहि लीने क्रीडा करत लाल मन भावत।
बीरी देत दास परमानंद हरखि निरखि जस गावत॥२॥
16- प्रथम गोचारण चले कन्हाई।
माथे मुकुट पीतांबर की छबी वनमाला पहराइ ॥१॥
कुंडल श्रवण कपोल बिराजत, सुंदरता बनि आइ ।
घर घरतें सब छाक लेत हे संग सखा सुखदाइ ॥२॥
आगें धेनु हांक लीनी पाछे मुरली बजाइ।
परमानंद प्रभु मनमोहन ब्रज बासिन सुरत कराइ॥३॥
17- कापर ढोटा नयन नचावत कोहे तिहारे बाबा की चेरी।
गोरस बेचन जात मधुपुरी आये अचानक वनमें घेरी॥१॥
सेननदे सब सखा बुलाये बात ही बात समस्या फेरी।
जाय पुकारों नंदजुके आगे जिन कोउ छुवो मटुकिया मेरी ॥२॥
गोकुल वसि तुम ढीट भये हो बहुते कान करत हों तेरी।
परमानंददास को ठाकुर बल बल जाऊं श्यामघन केरी॥३॥
18- आज दधि कंचन मोल भई।
जा दधि को ब्रह्मादिक इच्छत सो गोपन बांटि दई॥१॥
दधि के पलटे दुलरी दीनी जसुमति खबर भई।
परमानंददास को ठाकुर वरवट प्रीति नई॥२॥
19- रंचक चाखन देरी दह्यो।
अद्भुत स्वाद श्रवन सुनि मोपे नाहित परत रह्यो॥१॥
ज्यों ज्यों कर अंबुज उर ढांकत त्यों त्यों मरम लह्यो।
नंदकुमार छबीलो ढोटा अचरा धाय गह्यो॥२॥
हरि हठ करत दास परमानंद यह मैं बहुत सह्यो।
इन बातन खायो चाहत हो सेंत न जात बह्यो॥३॥
20- यह धन धर्म ही तें पायो।
नीके राखि जसोदा मैया नारायण ब्रज आयो॥१॥
जा धन को मुनि जप तप खोजत वेदहुं पार न पायो।
सों धन धर्यो क्षीर सागर में ब्रह्मा जाय जगायो॥२॥
जा धन तें गोकुल सुख लहियत, सगरे काज संवारे।
सो धन वार वार उर अंतर, परमानंद विचारे॥३॥
21- पद्म धर्यो जन ताप निवारण।
चक्र सुदर्शन धर्यो कमल कर भक्तन की रक्षा के कारण॥१॥
शंख धर्यो रिपु उदर विदारन, गदा धरि दुष्टन संहारन।
चारों भुजा चार आयुध धर नारायण भुव भार उतारन॥२॥
दीनानाथ दयाल जगत गुरू आरती हरन भक्त चिंतामन।
परमानंद दास को ठाकुर यह ओसर ओसर छांडो जिन॥३॥
22- आज बधाई को दिन नीको।
नंद घरनी जसुमति जायो है, लाल भामतो जीको॥१॥
पंच शब्द बाजे बाजत घर घर ते आयो टीको।
मंगल कलश लिये ब्रज सुंदरि, ग्वाल बनावत छीको॥२॥
देत असीस सकल गोपी जन चिरजीवो कोटि वरीसो।
परमानंद दास को ठाकुर गोप भेख जगदीसो॥३॥
23- रक्षा बंधन को दिन आयो।
गर्गादि सब देव बुलाये लालहिं तिलक बनायो॥१॥
सब गुरुजन मिल देत असीस चिरंजीयो ब्रजरायो।
बाढो प्रताप नित या ढोटा को परमानंद जस गायो॥२॥
24- राखी बांधत जसोदा मैया ।
बहु सिंगार सजे आभूषण गिरिधर भैया॥१॥
रतन खचित राखी बांधि कर, पुन पुन लेत बलैया।
सकल भोग आगे धर राखे, जनक जु लेहु कन्हैया ॥२॥
यह छबि देख मग्न नंद रानी, निरख निरख सचु पैया।
जियो जसोदा पूत तिहारो परमानंद बल जैया ॥३॥
25- जागो मेरे लाल जगत उजियारे ।
कोटिक मनमथ वारों मुसकनि पर कमल नयन अंखियन के तारे ॥१॥
संगले ग्वालबाल बछ सब संग लेउ जमुना जी के तट पर जाउ सवारे ।
परमानंद कहत नंदरानी दूर जिन जाउ मेरे ब्रज के रखवारे ॥२॥
26- गोपी प्रेम की ध्वजा ।
निज गोपाल किते अपने वश उरधर श्याम भुजा ॥१॥
शुक मुनि व्यास प्रशंसा कीनी ऊधो संत सराही ।
भुरि भाग्य गोकुल की वनिता अति पुनीत भवमांहि ॥२॥
कहा भयो जो विप्रकुल जनम्यो जो हरिसेवा नाही ।
सोई कुलीन दास परमानंद जो हरि सन्मुख धाई ॥३॥
27- तिहारे चरन कमल को माहत्म्य शिव जाने के गौतम नारी ।
जटाजुट मध्य पावनी गंगा अजहु लिये फिरत त्रिपुरारी ॥१॥
के जाने शुकदेव महामुनि के जाने सनकादिक चार ।
के जाने विरोचन को सुत सर्वस्व दे मेटी कुलगार ॥२॥
के जाने नारद मुनि ज्ञानी गुप्त फिरत त्रैलोक मंझार ।
के जाने हरिजन परमानंद जिनके हृदय बसत भुजचार ॥३॥
28- डोल माई झूलत हैं ब्रजनाथ ।
संग शिभित वृषभान नंदिनी ललिता विशाखा साथ ॥१॥
वाजत ताल मृदंग झांझ डफ रुंज मुरज बहु भांत ।
अति अनुराग भरे मिल गावत अति आनंद किलकात ॥२॥
चोवा चण्दन बूकावंदन उडत गुलाल अबीर ।
परमनानंद दास बलिहारी राजत हे बलवीर ॥३॥
29- श्री यमुने सुखकारनी प्राण प्रतिके ।
जिन्हे भूलि जात पिय सुधि करि देत, कहाँ लों कहिये इनके जु हित के ॥१॥
पिय संग गान करे उमंगी जो रस भरे, देत तारी कर लेत झटके ।
दास परमानन्द पाये अब ब्रजचन्द अहि जानत सब प्रेम गति के ॥२॥
30- श्री यमुने पिय को बस तुमजु कीने ।
प्रेम के फंद ते गहिजु राखे निकट ऐसे निर्मोल नग मोल लीने ॥१॥
तुमजु पठावत तहां अब धावत सदा, तिहारे रसरंग में रहत भीने ।
दास परमानन्द पाये अब ब्रजचन्द, परम उदार श्री यमुने जु दान दीने ॥२॥
31- श्री यमुने के साथ अब फ़िरत है नाथ ।
भक्त के मन के मनोरथ पूरन करत, कहां लो कहिये इनकी जु गाथ ॥१॥
विविध सिंगार आभूषन पहरे, अंग अंग शोभा वरनी न जात ।
दास परमानन्द पाये अब ब्रजचन्द राखे अपने शरण बहे जु जात ॥२॥
32- श्री यमुने की आस अब करत है दास ।
मन कर्म बचन जोरिके मांगत, निशदिन रखिये अपने जु पास ॥१॥
जहाँ पिय रसिकवर रसिकनी राधिका दोउ जन संग मिलि करत है रास।
दास परमानंद पाय अब ब्रजचन्द देखी सिराने नेन मन्दहास ॥२॥
33- आज ललन की होत सगाई ।
आवो गोपी जन मिल गावो मंगलचार बधाई ॥१॥
चोटी चुपरू गु्हू सुत तेरी, छाडों चंचलताई।
वृषभान गोप टीको दे पठयो सुंदर जान कन्हाई ॥२॥
जो तुमको या भात देखहें, करहे कहा बढाई ।
पहरे बसन भूषण सुंदर, उनको देवो दिखाई ॥३॥
नख शिख अंग सिंगार महर मन, मोतिन की माला पहराई ।
बेठे राय रतन चोकी पर, नर नारिन की भीर सुहाई ॥४॥
विप्र प्रवीन तिलक कर मस्तक, अक्षत चाप लियो अपनाई ।
बाजत ढोल भेरी और महुवर, नोबत ध्वनि घनघोर बजाई ॥५॥
फूली फिरत यशोदारानी, वार कुंवर पर वसन लुटाई ।
परमानंद नंद के आंगन, अमरगन पोहपन झर लाई ॥६
34- कुंज भवन में मंगलचार ।
नव दुलहन वृषभान नंदिनी, दूल्हे ब्रजराज कुमार ॥१॥
नये नये पुष्पकुंज के तोरण, नव पल्लवी बंदनवार ।
चोरी रची कदंब खंडी में, सघन लता मंडप विस्तार ॥२॥
करत वेद ध्वनि विप्र मधुप गण कोकिला गण गावत अनुसार ।
दीनी भूर दास परमानंद प्रेम भक्ति रतन के हार ॥३॥
35- गावत गोपी मधु मृदु बानी ।
जाके भवन बसत त्रिभुवनपति राजा नंद यसोदा रानी ॥१॥
गावत वेद भारती गावत गावत नारदादि मुनि ज्ञानी ।
गावत गुन गंधर्व काल सिव गोकुल नाथ महात्तम जानी ॥२॥
गावत चतुरानन जगनायक गावत शेष सहस्त्र मुखरासी ।
मन क्रम बचन प्रीति पद अंबुज अब गावत ‘परमानंद’ दासी ॥३॥

