अमरूशतकम्-८

अनेक नायिकाओं से रमण करनें वाले नायक के व्यवहार से खिन्न नायिका से चतुर सखी कहती है- "हे कातरे,बाहर से भोली किन्तु भीतर से कुटिल नारियाँ तुम्हारे प्रिय पर डाका…

अमरूशतकम्-७

बारबार अनुनय करनें पर भी मानत्याग न करनें वाली माननी से सखी कह रही है- "हे कठिन हृदये! देख,बाहर तुम्हारा प्रियतम सिर झुकाये धरती कुरेद रहा है,सखियाँ बिना खाये पिये…

अमरूशतकम्-६

माननी नायिका की सखी नायक से कह रही है- "तुमनें ही इसे इतना अधिक प्यार दिया(तुम यह न समझना कि यह प्यार पानें के लिये ऐसा कर रही है),तुमनें ही…

अमरूशतकम्-५

नायक द्वारा सिखा कर भेजी गयी सखी मान(attitude)छोड़ देनें के लिये नायिका को डरा रही है- "रे कोपने,इस प्रकार उंगलियों के नख से आँसुओं की बूँदों को टुकड़े-टुकड़े करती हुयी…

अमरूशतकम्-४

हे मुग्धे,आलस्य से तिरछे,प्रीति से भीगे,बार बार प्रयत्नपूर्वक अँधमुदें ही क्षण भर के लिये सम्मुख होकर पुन: लज्जा से अपनी ओर फेरे हुये चंचल तथा पलक न गिराने वाले और…

अमरूशतकम्-३

विपरीत रति में बिखरी हुयी अलकावलियाँ तथा हिलते हुये कुंडलों को धारण करनें वाला,अत्यंत सूक्ष्म पसीने की बूँदों से कुछ पुँछे हुये तिलक वाला और सुरतान्त में अलसाये हुये नेत्रों…

अमरूशतकम्-२

परकीय-गमन को भाँप जानें वाली नायिका जिस प्रकार शठ नायक के हाथ पकड़नें पर उसे झटक देती है,आंचल पकड़नें पर उसे बलपूर्वक लीलाकमल से पीटने लगती है,केश पकड़नें पर उसे…

अमरूशतकम्-१

नृत्य लीला में धनुष की डोरी खींचनें में खटकामुखमुद्रा वाले(कान तक पहुँचे हुये) हाथ की पीठ पर अठखेलियाँ करती हुयी नखकिरणों से अनुरंजित अतएव मंजरीयुक्त किसलयकर्णपूर के चारो ओर घूमते…

उपनिषद्

. ईशावास्‍य उपनिषद् 1. Ishavasya Upanishad २. केन उपनिषद् 2.   Kena Upanishad ३. कठ उपनिषद् 3. Katha Upanishad ४. प्रश्‍न उपनिषद् 4. Prashna Upanishad ५. मुण्डक उपनिषद् 5. Mundaka…