पुष्टि प्रवाह मर्यादा

पुष्टि प्रवाह मर्यादा (संस्कृत) पुष्टि प्रवाह मर्यादा (हिंदी) Pushti Pravah Maryada (English) पुष्टिप्रवाह मर्यादा विशेषेण पृथक पृथक। जीव-देह-क्रियाभेदैः प्रवाहेण फलेन च॥१॥ The path of Grace, the worldly path and the path of…

सिद्धान्त मुक्तावली

सिद्धान्त मुक्तावली  (संस्कृत)सिद्धान्त मुक्तावली (हिंदी)Siddhant Muktavali (English)नत्वा हरिं प्रवक्ष्यामि स्वसिद्धांत विनिश्चयम। कृष्ण सेवा सदा कार्या मानसी सा परा स्मृता॥१॥ After bowing down to Hari Shree KRUSHNA I tell decisively established doctrines…

भक्तिवर्धिनी

भक्तिवर्धिनी (मूल संस्कृत) भक्तिवर्धिनी (हिंदी भावानुवाद) Bhaktivardhini (English) यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्त- थोपायो निरूप्यते। बीजभावे दृढ़े तु स्यात्त्- यागाच्छ्रवणकीर्तनात्‌॥१॥ जिस प्रकार से भक्ति वृद्धि को प्राप्त होती है अब उस…

पञ्चपद्यानि

पञ्चपद्यानि (मूल संस्कृत) पञ्चपद्यानि (हिंदी भावानुवाद) PanchPadyani (English) श्रीकृष्णरसविक्षिप्त- मानसा रतिवर्जिताः। अनिर्वृतालोकवेदे ते मुख्याः श्रवणोत्सुकाः॥१॥ भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में पूर्ण मन से लीन रहने वाले, अन्य आकर्षणों से विरक्त…

बालबोध

बालबोध (संस्कृत) बालबोध (हिंदी) Balbodh (English) नत्वा हरिं सदानन्दं सर्व सिद्धान्त संग्रहम्। बालप्रबोधनार्थाय वदामि सुविनिश्चितम्॥१॥ सदा आनंद रूप श्रीहरि को नमस्कार करके, सब सिद्धांतों के सुनिश्चित सार-संग्रह को साधकों की जानकारी के…

कृष्णाश्रय

कृष्णाश्रय (मूल संस्कृत) कृष्णाश्रय (हिंदी भावानुवाद) Krishnashray (English) सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खलधर्मिणि। पाषण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम॥१॥ कलियुग में धर्म के सभी मार्ग नष्ट हो गए हैं, विश्व में…

कृष्णाष्टकम्

कृष्णाष्टकम् (मूल संस्कृत) कृष्णाष्टकम् (हिंदी भावानुवाद) Krishnashtakam (English) कृष्णप्रेममयी राधा राधाप्रेममयो हरिः। जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम ॥१॥ श्रीराधारानी श्रीकृष्ण प्रेम से ओत प्रोत हैं और श्रीकृष्ण श्रीराधारानी के प्रेम से। जीवन के नित्य धनस्वरुपश्रीराधाकृष्ण मेरा…

मधुराष्टकम्

मधुराष्टकम् (मूल संस्कृत) मधुराष्टकम् (हिंदी भावानुवाद) Madhurashtakam (English) अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम्। हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥१॥ आपके होंठ मधुर हैं, आपका मुख मधुर है,…

श्री सीताजी को पार्वती जी का वरदान

देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि। निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि॥234॥ मृग, पक्षी और वृक्षों को देखने के बहाने सीताजी बार-बार घूम जाती हैं और…

श्री सीता-रामजी का पुष्पवाटिका में परस्पर दर्शन

उठे लखनु निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान। गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान॥226॥ रात बीतने पर, मुर्गे का शब्द कानों से सुनकर लक्ष्मणजी उठे। जगत के स्वामी सुजान…