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कर्णजीवातुभूतम् (कीमिया-ए-इश्क़)
-1- विरञ्चिना विरचिता सुन्दरि! त्वं न सुन्दरी।तथा, यथा मनस्तूल्या मया त्वं सुन्दरीकृता॥ हे सुन्दरी,ब्रह्मा ने भी तुम्हें उतना सुन्दर नहीं बनाया हैजितना कि मैंने अपने मन की कूँची से सँवारकरतुम्हें…