1- मन सभी प्रवत्तियों का पुरोगामी है,मन उनका प्रधान है,वे मनोमय हैं,यदि कोई दोषयुक्त मन से बोलता है या कर्म करता है तो दुख उसका अनुसरण वैसे ही करता है…
अब भक्ति की व्याख्या करेंगे l वह ईश्वर के प्रति परम प्रेम रूपा है। और अमृतस्वरूपा भी है। जिसको पाकर मनुष्य सिद्ध हो जाता है,अमर हो जाता है,तृप्त हो जाता…