अमरूशतकम्-१२

सखी सखी से कह रही है- "हे प्रिय,एक पहर बीतनें पर या दोपहर या तीसरे पहर या सारा दिन बीत जानें पर सायंकाल यहाँ लौट आओगे न!,इस प्रकार आँसू तथा…

अमरूशतकम्-११

सखियों से मान(attitude) की शिक्षा ग्रहण करनें वाली मुग्धा नायिका अपने मान का अर्थ बता रही है- “मैनें उनके सामनें आते ही मुख नीचे कर लिया(और जब आँखे उन्हे देखनें…

अमरूशतकम्-१०

परदेश जानें का विचार छोड देने वाला नायक कारण पूँछनें पर अपनें मित्र से कह रहा है-- "जब मैनें अपनी प्रिया से रूँधे हुये गले से कहा कि 'हे सुन्दरी,…

अमरूशतकम्-९

कवि अधीरा प्रगल्भा नायिका और शठ नायक के व्यापारों का वर्णन करता हुआ कहता है-- "सायंकाल क्रोध से भरी नायिका चंचल तथा कोमल बाहुपाश से पति को भलीभाँति बाँध कर…

अमरूशतकम्-८

अनेक नायिकाओं से रमण करनें वाले नायक के व्यवहार से खिन्न नायिका से चतुर सखी कहती है- "हे कातरे,बाहर से भोली किन्तु भीतर से कुटिल नारियाँ तुम्हारे प्रिय पर डाका…

अमरूशतकम्-७

बारबार अनुनय करनें पर भी मानत्याग न करनें वाली माननी से सखी कह रही है- "हे कठिन हृदये! देख,बाहर तुम्हारा प्रियतम सिर झुकाये धरती कुरेद रहा है,सखियाँ बिना खाये पिये…

अमरूशतकम्-६

माननी नायिका की सखी नायक से कह रही है- "तुमनें ही इसे इतना अधिक प्यार दिया(तुम यह न समझना कि यह प्यार पानें के लिये ऐसा कर रही है),तुमनें ही…

अमरूशतकम्-५

नायक द्वारा सिखा कर भेजी गयी सखी मान(attitude)छोड़ देनें के लिये नायिका को डरा रही है- "रे कोपने,इस प्रकार उंगलियों के नख से आँसुओं की बूँदों को टुकड़े-टुकड़े करती हुयी…

अमरूशतकम्-४

हे मुग्धे,आलस्य से तिरछे,प्रीति से भीगे,बार बार प्रयत्नपूर्वक अँधमुदें ही क्षण भर के लिये सम्मुख होकर पुन: लज्जा से अपनी ओर फेरे हुये चंचल तथा पलक न गिराने वाले और…

अमरूशतकम्-३

विपरीत रति में बिखरी हुयी अलकावलियाँ तथा हिलते हुये कुंडलों को धारण करनें वाला,अत्यंत सूक्ष्म पसीने की बूँदों से कुछ पुँछे हुये तिलक वाला और सुरतान्त में अलसाये हुये नेत्रों…