तंत्र सूत्र–विधि -48 (ओशो) काम संबंधि पहला सूत्र–

      ‘’काम-आलिंगन में आरंभ में उसकी आरंभिक अग्‍नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो।‘’       कई कारणों से काम कृत्‍य गहन परितृप्‍ति बन सकता है…

“युवक और यौन !”

जिस दिन दुनिया में सेक्‍स स्‍वीकृत होगा, जैसा कि भोजन, स्‍नान स्‍वीकृत है। उस दिन दुनिया में अश्‍लील पोस्‍टर नहीं लगेंगे। अश्‍लील किताबें नहीं छपेगी। अश्‍लील मंदिर नहीं बनेंगे। क्‍योंकि…

कामवासना क्यों तिरोहित हो जाती है बुद्ध में ?

बुद्ध जीते हैं सबसे ऊंची संवेदनशीलता सहित और इससे वे पूरी अनुभूति पाते है अपनी सारी शारीरिक आवश्यकताओं की। क्या कामवासना भी एक शारीरिक आवश्यकता नहीं है तो फिर क्यों…

ब्राह्मण वही,जिसकी कामवासना ब्रह्मचर्य बनी|

ब्राह्मण-सूत्र : 2 दिव्व-माणुसत्तेरिच्छं, जो न सेवइ मेहुणं। मणसा काय-वक्केणं, तं वयं बूम माहणं ।।भ जहा पोम्मं जले जायं, नोवलिप्पइ वारिणा। एवं अलित्तं कामेहिं, तं वयं बूम माहणं ।। आलोलुयं मुहाजीविं, अणगारं अकिंचणं। असंसत्तं गिहत्थेसु, तं वयं बूम माहणं ।। जो देवता, मनुष्य तथा तियच संबंधी सभी प्रकार के मैथुन का मन, वाणी और शरीर से कभी सेवन नहीं करता, उसे हम ब्राह्मण…

अमरूशतकम्-१६

दंपत्योर्निशि जल्पतोर्गृहशुकेनाकर्णितं यद्वच- स्तत्प्रातर्गुरूसंनिधौ निगदत: श्रुत्वैव तारं वधू:। कर्णालम्बितपद्मरागशकलं विन्यस्य चन्च्वा: पुरा ब्रीडार्ता प्रकरोति दाडिमफलव्याजेन वाग्बन्धनम्।। सखी सखी से कह रही है- रात में दम्पति नें जो बातें की थीं…

अमरूशतकम्-१५

कखमपि सखि! क्रीडाकोपाद्व्रजेति मयोदिते कठिनहृदय: शय्यां त्यक्त्वाबलाद् गतएव स:। इति सरभसं ध्वस्तप्रेम्णि व्यपेतघृणे स्पृहां पुनरपि हतव्रीडं चेत: करोति करोति किम्।।१५।। प्रणयकलहान्तरिता नायिका सखी से कहता है-- सखि,मैनें तो प्रणयकोप में…

अमरूशतकम्-१४

कृतो दूरादेव स्मितमधुरमभ्युद्गमविधि: शिरस्याज्ञा नयस्ता प्रतिवचनवत्यानतिमति। न दृष्टे: शैथिल्यं मिलन इति चेतो दहति मे निगूढान्त:कोषा कठिनहृदये!संवृतिकियम्।।१४।। शठ नायक मानिनी नायिका से कहता है-- "हे कठिन हृदये,तुमनें दूर से हँसते हुये…

अमरूशतकम्-१३

कवि की उक्ति है-"आधी रात में जलबर्षा करते हुये बादल की गम्भीर ध्वनि सुनकर(राह के गाँव में डेरा डाले) बेचारे पथिक को दूरदेश में पड़ी हुयी विरहिणी बाला की याद…