ओशो की मधुशाला में शंकर

ओशो की मधुशाला में शंकर

**भगवान रजनीश के 94वें जन्मदिवस पर:

आदि शंकराचार्य, सनातन और आधुनिक आध्यात्म की निरंतर धारा**

नमस्कार दोस्तों!
आज भगवान रजनीश (ओशो) के 94वें जन्मदिवस पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। आचार्य रजनीश किसी परिचय के मोहताज नहीं—वे उन विरलों में से हैं जिन्होंने अपने जीवनकाल में ही लाखों–करोड़ों हृदयों को स्पर्श किया, और जिनकी यह आध्यात्मिक धारा आज भी निरंतर प्रवाहमान है, प्रतिवर्ष और अधिक विस्तृत होती हुई।

सनातन पर जमी धूल को हटाने वाला एक “ऋषि-दृष्टा”

सदियों की गुलामी, मुगलकाल और सामाजिक अवनति के दौरान सनातन धर्म में बहुत-सी बाहरी, अप्राकृतिक और आयातित चीजें जुड़ गईं। समय के साथ जब कोई दिशा देने वाला नहीं रहा, ये विसंगतियाँ धर्म का ही हिस्सा मानी जाने लगीं।

ओशो ने—एक ऋषि की स्वच्छ, पैनी और मिस्टिक दृष्टि से—इन पर जमी धूल को झाड़ने का कार्य किया। उन्होंने धर्म का खंडन नहीं किया; उन्होंने असत्य को हटाया और सत्य को उजागर किया। यही उनकी दृष्टि की मौलिकता है।

ओशो अक्सर कहते थे कि उनका पिछला जन्म लगभग 700 वर्ष पहले हुआ था। संभव है कि उन्हें उस मूल सनातन स्वरूप की प्रत्यक्ष अनुभूति रही हो—और इसीलिए वे आज की विसंगतियों पर इतनी स्पष्ट दृष्टि रख सके।

ओशो का युग: एक मौन पुनर्जागरण

ओशो का सक्रिय आध्यात्मिक जीवन 1947 के बाद, स्वतंत्र भारत के आरंभिक काल से लेकर 1990 तक फैला रहा—एक ऐसा दौर जब देश ग्लोबलाइजेशन की दहलीज पर था। यह लगभग 40 वर्ष का कालखंड वास्तव में एक आध्यात्मिक पुनर्जागरण का युग था।

उस समय देश में सेकुलरिज़्म का माहौल काफ़ी सख्त था। गेरुआ वस्त्र, माला और संन्यासी जीवन को सार्वजनिक रूप में स्वीकार करना आसान नहीं था। किंतु भगवान रजनीश ने असंभव-सी प्रतीत होती परिस्थितियों में भी एक नई आध्यात्मिक चेतना का बीज बोया—जो आज विराट वृक्ष बन चुकी है।

आज जब सनातन और हिंदुत्व गर्व का विषय बन चुके हैं, तब याद करना चाहिए कि ऐसे प्रतीकों को पुनर्जीवित करने की पहली साहसिक भूमिका ओशो ने ही निभाई थी।

आदि शंकराचार्य: एक राष्ट्र का आध्यात्मिक आधार

यदि भारत को एक आध्यात्मिक राष्ट्र के रूप में किसी ने सूत्रबद्ध किया तो वह हैं भगवान आदि शंकराचार्य—जिन्होंने अद्वैत वेदान्त के माध्यम से उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम पूरे देश को जोड़ दिया। केवल 32 वर्ष की आयु में उन्होंने भाष्य, ग्रंथ, स्तोत्र, श्रीयंत्र और पूजा-विधियों की स्थापना कर दी।

उनका अवतरण एक विशेष उद्देश्यपूर्ण था—मानो वे केवल कार्य पूर्ण करने आए हों।

ओशो आदि शंकराचार्य के महान योगदान को भली-भाँति समझते थे। उन्होंने “भज गोविंदम्” पर दस अद्भुत प्रवचन दिए और स्वीकार किया कि शंकराचार्य जैसी आध्यात्मिक ऊँचाई केवल एक दिव्य व्यक्तित्व ही दे सकता है।

समकालीन शंकराचार्यों पर एक दृष्टि

वर्तमान शंकराचार्यों के बारे में मैं विस्तृत टिप्पणी नहीं करना चाहता। वे आजकल आध्यात्मिक चिंतन से अधिक राजनीतिक चर्चाओं में संलग्न दिखते हैं। यह भी आवश्यक होगा—परंतु यह आध्यात्म का कार्य नहीं है।

अफसोस की बात यह है कि कुछ मठों में “सिद्धियाँ”, “यंत्र”, “गुप्त साधनाएँ” पैसे लेकर देने जैसी घोषणाएँ की जा रही हैं। यह परंपरा को कलंकित करता है, और इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है।

वर्तमान समय की चुनौती: सूचना का विस्फोट

आज सोशल मीडिया के युग में मन निरंतर उत्तेजित और अशांत है। रील्स, वीडियो, तेज़ दृश्य—मन को लगातार एक विचार से दूसरे विचार की ओर धकेलते रहते हैं। यह अभूतपूर्व मानसिक अशांति व्यक्ति को भीतर की आवाज़, कृष्ण की मुरली और परमात्मा के संगीत से दूर कर देती है।

डिप्रेशन, अनिद्रा, बेचैनी—ये सब इसी अशांति के परिणाम हैं।

यहाँ ओशो का योगदान अद्वितीय है

आदि शंकराचार्य की विधियाँ अत्यंत सरल और सत्-स्वभाव वाले मनुष्य के लिए थीं—जैसे 1200–1500 वर्ष पूर्व के लोग। लेकिन आधुनिक मनुष्य अत्यधिक जटिल, तनावग्रस्त और मानसिक रूप से बिखरा हुआ है।

ओशो ने ध्यान की ऐसी सक्रिय विधियाँ दीं जो आधुनिक मन को तैयार करती हैं—पहले उसे खाली करती हैं, फिर उसे स्थिर करती हैं। आज यदि कोई मनुष्य वास्तव में आध्यात्म की ओर बढ़ सकता है तो वह ओशो द्वारा दी गई विधियों के माध्यम से ही।

ध्यान साधना: एक घंटे की अनिवार्यता

ध्यान 5–10 मिनट का मनोरंजन नहीं है। ओशो कहते हैं—
• 40 मिनट मन को शांत करने में लगते हैं
• उसके बाद 20 मिनट ही वास्तविक ध्यान संभव होता है

इसलिए ध्यान का एक घंटा आवश्यक है।
जैसे जिम, संगीत, अध्ययन—सबके लिए हम समय निकालते हैं, वैसे ही ध्यान भी समय चाहता है।

यह मार्ग प्रयोग का है; बिना प्रयोग किए कोई राय बनाना भ्रांति ही होगी।

आमंत्रण

यदि आप स्वयं को सनातनी मानते हैं, आध्यात्मिक पथ के साधक हैं और सच में ईश्वर को पाना चाहते हैं—तो साधना का मार्ग आज भी ओशो ध्यान केंद्रों में उपलब्ध है।

प्रत्येक रविवार ध्यान शिविर होते हैं। आइए, एक घंटा परमात्मा को दीजिए। वही एक घंटा जीवन को बदल देता है।

अंत में: आदि शंकराचार्य का अमर संदेश

शंकराचार्य जी का भज गोविंदम् मात्र एक स्तोत्र नहीं—यह आत्मजागरण का शंखनाद है। इसका सार है—

“मोहग्रस्त बुद्धि वाले मित्र, गोविंद को भजो।
मृत्यु के समय व्याकरण के नियम तुम्हारी रक्षा नहीं करेंगे।”

वैराग्य, विवेक, सत्संग, निर्मोह और निश्चल तत्व—इन्हीं से मोक्ष का मार्ग खुलता है।

अंत में, मैं आप सभी का धन्यवाद करता हूँ कि आपने प्रेम और शांति से इस वार्ता को सुना।
ॐ नमः शिवाय।
श्री रजनीशाय नमः।

नमस्कार।
धन्यवाद।

https://youtu.be/GmQhC8QJtng?si=6Rdr3qi7V4qSLmD5

Osho 94th Birthday Bhagwan Rajneesh Osho and Adi Shankaracharya Sanatan Dharma Reformation Osho Meditation Methods Bhaj Govindam Osho Modern Spirituality India Osho Spiritual Revival Adi Shankaracharya Philosophy Hindu Renaissance and OshoSanatan Dharma in Modern Age Osho Discourses on Shankaracharya Indian Spiritual Masters Osho Meditation Centres India Shankaracharya Legacy Hinduism and Spiritual Growth Osho Dynamic Meditation Benefits Contemporary Hindu Spirituality Osho Teachings on Religion Spiritual Awakening in IndiaHow Osho revived the essence of Sanatan Dharma Relationship between Osho and Adi Shankaracharya’s teachings Is Osho the modern Shankaracharya? Osho views on Hinduism and spirituality Why Osho meditation is importanttoday#Osho#BhagwanRajneesh#OshoMeditation#SanatanDharma#AdiShankaracharya#HinduSpirituality#BhajGovindam#SpiritualIndia#IndianSpirituality #OshoTeachings #OshoQuotes#ModernSpirituality#OshoLovers#RajneeshMovement#SanatanRenaissance#VedantaWisdom#HinduPhilosophy#SpiritualAwakeningIndia#MeditationJourney#AwakenYourSoul#OshoOnShankaracharya#SanatanRebirth#MysticIndia#HinduMeditation#OshoDhyan#OshoSannyas#AdvaitaTeachings#ShankaracharyaThoughts#DivineConsciousness#InnerTransformation