मुझे न पद कंचन की चाह,मुझे न ललनायें डहकायें।
मुझे न दम्भ, न झूठा मान, न ही भौतिक सुख बहकायें।
मुझे चाहिए एक शांत मन, जहाँ सत्य का हो प्रकाश।
जहाँ प्रेम की हो बहती धारा ,और दया की हो सुवास।
ये जग मायामय है क्षणिक, आनी-जानी सब बातें हैं।
सच्ची दौलत नेक कर्म ही, जो सनातन साथ निभाते हैं।
छोड़ व्यर्थ सारी चिंताएँ, स्वकर्तव्य पर अटल रहना है
मानवता की सेवा में ही, सार्थक जीवन यह करना है।
ऋषियोगी
