विज्ञान भैरव तंत्र

1- हे देवी, यह अनुभव दो श्वास के बीच घटित हो सकता है।
श्वास के भीतर आने के पश्चात और बाहर लौटने के ठीक पूर्व
श्रेयश है, कल्याण है।

2- ” या जब कभी अन्तः श्वास और बहिर्श्वांस एक दूसरे में विलीन होती हैं , उस क्षण में ऊर्जारहित , ऊर्जापूरित  केन्द्र को स्पर्श करो . ” 

3- ” जब श्वास नीचे से ऊपर की ओर मुड़ती है , और फिर जब श्वास ऊपर से नीचे की ओर मुड़ती है — इन दो मोड़ों के द्वारा उपलब्ध हो . “

4- ” या जब श्वास पूरी तरह बाहर गई है और स्वतः ठहरी है , या पूरी तरह भीतर आई है और ठहरी है — ऐसे जागतिक विराम के क्षण में व्यक्ति का क्षुद्र अहंकार विसर्जित हो जाता है . केवल अशुद्ध के लिए यह कठिन है.

5- ” भृकुटियों के बीच अवधान को स्थिर कर विचार को मन के सामने करो. फिर सहस्रार तक रूप को प्राण-तत्व से, प्राण से भरने दो. वहां वह प्रकाश की तरह बरसेगा.”

6- ” ललाट के मध्य में सूक्ष्म श्वास (प्राण) को टिकाओ . जब वह सोने के क्षण में हृदय  तक पहुंचेगा तब स्वप्न और स्वयं मृत्यु पर अधिकार हो जायेगा. “

7- सांसारिक कार्यों में लगे हुये अवधान को दो श्वासों के बीच टिकाओ । इस अभ्यास से थोड़े ही दिन में नया जन्म होगा ।

8- ” आत्यंतिक भक्तिपूर्वक श्वास के दो संधि-स्थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो .”

9- ” मृतवत लेट रहो . क्रोध से क्षुब्ध होकर उसमें ठहरे रहो . या पुतलियों को घुमाए बिना एकटक घूरते रहो . या कुछ चूसो और चूसना बन जाओ .”

10- ” प्रिय देवी , प्रेम किये जाने के क्षण में प्रेम में ऐसे प्रवेश करो जैसे कि वह नित्य जीवन हो .”

11- ” जब चींटी के रेंगने की अनुभूति हो तो इन्द्रियों के द्वार बंद कर दो . तब ! “

12- ” जब किसी बिस्तर या आसन पर हो तो अपने को वजनशून्य हो जाने दो — मन के पार .”

13- ” या कल्पना करो कि मयूर की पूंछ के पंचरंगे वर्तुल निस्सीम अंतरिक्ष में तुम्हारी पांच इन्द्रियां हैं . अब उनके सौंदर्य को भीतर ही घुलने दो . उसी प्रकार शून्य में या दीवार पर किसी बिंदु के साथ कल्पना करो , जब तक कि वह बिंदु विलीन न हो जाए . तब दूसरे के लिए तुम्हारी कामना सच हो जाती है .”

14- ” अपने पूरे अवधान को अपने मेरुदंड के मध्य में कमल-तंतु सी कोमल स्नायु में स्थित करो . और इसमें रूपांतरित हो जाओ .”

15- ” सिर के सात द्वारों को अपने हाथों से बंद करने पर आँखों के बीच का स्थान सर्वग्राही हो जाता है .”

16- ” हे भगवती , जब इन्द्रियां हृदय में विलीन हों , कमल के केन्द्र पर पहुँचो .”

17- ” मन को भूलकर मध्य में रहो — जब तक.”

18- ” किसी विषय को प्रेमपूर्वक देखो ; दूसरे विषय पर मत जाओ . यहीं विषय के मध्य में – आनंद .”

19- ” पांवों या हाथों को सहारा दिये बिना सिर्फ नितंबों पर बैठो . अचानक केंद्रित हो जाओगे .”

20- ” किसी चलते वाहन में लयबद्ध झूलने के द्वारा , अनुभव को प्राप्त हो . या किसी अचल वाहन में अपने को मंद से मन्दतर होते  अदृश्य वर्तुलों में झूलने देने से भी .”

21- “अपने अमृत-भरे शरीर के किसी अंग को सुई से भेदों , और भद्रता के साथ उस भेदन में प्रवेश करो , और आंतरिक शुद्धि को उपलब्ध होओ .”

22- “अपने अवधान को ऐसी जगह रखो , जहाँ तुम अतीत की किसी घटना को देख रहे हो और अपने शरीर को भी . रूप के वर्तमान लक्षण खो जायेंगे , और तुम रूपांतरित हो जाओगे .”

23- ” अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो . इस एक को छोड़कर अन्य सभी विषयों की अनुपस्थिति को अनुभव करो . फिर विषय-भाव और अनुपस्थिति-भाव को भी छोड़कर आत्मोपलब्ध होओ .”

24- “जब किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में कोई भाव उठे तो उसे उस व्यक्ति पर मत आरोपित करो , बल्कि केंद्रित रहो .”

25- “जैसे ही कुछ करने की वृत्ति हो , रुक जाओ .”

26- ” जब कोई कामना उठे , उस पर विमर्श करो . फिर , अचानक , उसे छोड़ दो .”

27- “पूरी तरह थकने तक घुमते रहो , और तब , जमीन पर गिरकर , इस गिरने में पूर्ण होओ .”

28- ” कल्पना करो कि तुम धीरे-धीरे शक्ति या ज्ञान से वंचित किये जा रहे हो . वंचित किये जाने के क्षण में , अतिक्रमण करो .”

29- ” भक्ति मुक्त करती है “

30- ” आंखें बंद करके अपने अंतरस्थ अस्तित्व को विस्तार से देखो .”

31- ” किसी कटोरे को उसके पार्श्व-भाग या पदार्थ को देखे बिना देखो . थोड़े ही क्षणों में बोध को उपलब्ध हो जाओ . “

32- “किसी सुंदर व्यक्ति या सामान्य विषय को ऐसे देखो जैसे उसे पहली बार देख रहे हो .”

33- “बादलों के पार नीलाकाश को देखने मात्र से शान्ति को , सौम्यता को उपलब्ध होओ .”

34- “किसी गहरे कुएं के किनारे खड़े होकर उसकी गहराइयों में निरंतर देखते रहो — जब तक विस्मय-विमुग्ध न हो जाओ .”

35- “जब परम रहस्यमय उपदेश दिया जा रहा हो , उसे श्रवण करो . अविचल , अपलक आँखों से ; अविलम्ब परम मुक्ति को उपलब्ध होओ .”

36- “किसी विषय को देखो , फिर धीरे-धीरे उससे अपनी दृष्टि हटा लो , और फिर धीरे-धीरे उससे अपने विचार हटा लो . तब !’

37- “हे देवी , बोध के मधु-भरे दृष्टिपथ में संस्कृत वर्णमाला के अक्षरों की कल्पना करो–पहले अक्षरों की भांति , फिर सूक्ष्मतर ध्वनि की भांति , और फिर सूक्ष्मतम भाव की भांति . और तब , उन्हें छोड़कर मुक्त होओ.”

38- “ध्वनि के केन्द्र में स्नान करो , मानो किसी जलप्रपात की अखंड ध्वनि में स्नान कर रहे हो . या कानों में अंगुली डालकर नादों के नाद , अनाहत को सुनो .”

39-” “ओम् जैसी किसी ध्वनि का मंद-मंद उच्चारण करो .”

40- “किसी भी अक्षर के उच्चारण के आरम्भ में और उसके क्रमिक परिष्कार में , निर्ध्वनि में जागो .”

41- “तार वाले वाद्यों को सुनते हुए उनकी संयुक्त केन्द्रीय ध्वनि को सुनो ; इस प्रकार सर्व व्यापकता को उपलब्ध होओ .”

42- “किसी ध्वनि का उच्चार ऐसे करो कि वह सुनाई दे ; फिर उस उच्चार को मंद से मन्दतर किये जाओ — जैसे-जैसे भाव मौन लयबद्धता में लीन होता जाए .”

43- “मुंह को थोड़ा-सा खुला रखते हुए मन को जीभ के बीच में स्थिर करो . अथवा जब सांस चुपचाप भीतर आये , हकार ध्वनि को अनुभव करो .”

44- “अ और म के बिना ओम् ध्वनि पर मन को एकाग्र करो .”

45- “अः से अंत होने वाले किसी शब्द का उच्चार चुपचाप करो . और तब हकार में अनायास सहजता को उपलब्ध होओ .”

46- ” कानों को दबाकर और गुदा को सिकोड़कर बंद करो , और ध्वनि में प्रवेश करो .”

47- “अपने नाम की ध्वनि में प्रवेश करो , और उस ध्वनि के द्वारा सभी ध्वनियों में .”

48- “काम-आलिंगन  के आरम्भ में उसकी आरंभिक अग्नि पर अवधान दो , और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो .”

49- “ऐसे काम-आलिंगन में जब तुम्हारी इन्द्रियां पत्तों की भांति कांपने लगें , उस कंपन में प्रवेश करो .”

50- “काम-आलिंगन के बिना ऐसे मिलन का स्मरण करके भी रूपांतरण होगा .”

51- “बहुत समय के बाद किसी मित्र से मिलने पर जो हर्ष होता है , उस हर्ष में लीन होओ .”

52- “भोजन करते हुए या पानी पीते हुए भोजन या पानी का स्वाद ही बन जाओ , और उससे भर जाओ .”

53- “जहां-जहां , जिस किसी कृत्य में संतोष मिलता हो , उसे वास्तविक करो .”

54- “हे कमलाक्षी , हे सुभगे , गाते हुए , देखते हुए , स्वाद लेते हुए यह बोध बना रहे कि मैं हूं , और शाश्वत आविर्भूत होता है .”

55- “जब नींद अभी नहीं आयी हो और बाह्य जागरण विदा हो गया हो , उस मध्य बिंदु पर बोधपूर्ण रहने से आत्मा प्रकाशित होती है “

56- “भ्रांतियां छलती हैं , रंग सीमित करते हैं , विभाज्य भी अविभाज्य हैं .”

57- “तीव्र कामना की मनोदशा में अनुद्विग्न रहो .”

58- “यह तथाकथित जगत जादूगरी जैसा या चित्र-कृति जैसा भासता है . सुखी होने के लिए उसे वैसा ही देखो .”

59- “प्रिये , न सुख में और न दुःख में ,  बल्कि दोनों के मध्य में अवधान को स्थिर करो . “

60- “विषय और वासना जैसे दूसरों में हैं वैसे ही मुझमें हैं . इस भांति स्वीकार करके उन्हें रूपांतरित होने दो .”

61- “जैसे जल से लहरें उठती हैं और अग्नि से लपटें , वैसे ही सर्वव्यापक हम से लहराता है .”

62- “जब किसी इन्द्रिय-विशेष के द्वारा स्पष्ट बोध हो , उसी बोध में स्थित होओ .”

63- “जहां कहीं तुम्हारा मन भटकता है , भीतर या बाहर , उसी स्थान पर , यह .”

64- “छींक के आरम्भ में , भय में , चिंता में , खाई-खड्ड के कगार पर , युद्ध से भागने पर , अत्यंत कुतूहल में , भूख के आरंभ में और भूख के अंत में , सतत बोध रखो .”

65- “अन्य देशनाओं के लिए जो शुद्धता है वह हमारे लिए अशुद्धता ही है . वस्तुतः किसी को भी शुद्ध या अशुद्ध की तरह मत जानो .”

66- “मित्र और अजनबी के प्रति , मान और अपमान में , असमता के बीच समभाव रखो .”

67-“यह जगत परिवर्तन का है , परिवर्तन ही परिवर्तन का . परिवर्तन के द्वारा परिवर्तन को विसर्जित करो .”

68- “जैसे मुर्गी अपने बच्चों का पालन-पोषण करती है , वैसे ही यथार्थ में विशेष ज्ञान और विशेष कृत्य का पालन-पोषण करो .”

69- “यथार्थतः बंधन और मोक्ष सापेक्ष हैं ; ये केवल विश्व से भयभीत लोगों के लिए हैं . यह विश्व मन का प्रतिबिंब है . जैसे तुम पानी में एक सूर्य के अनेक सूर्य देखते हो , वैसे ही बंधन और मोक्ष को देखो .”

70- “अपनी प्राण-शक्ति को मेरुदंड में ऊपर उठती , एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र की ओर गति करती हुई प्रकाश-किरण समझों ; और इस भांति तुममें जीवंतता .”

71- “या बीच के रिक्त स्थानों में यह बिजली कौंधने जैसा है–ऐसा भाव करो .”

72- “भाव करो कि ब्रह्मांड एक पारदर्शी शाश्वत उपस्थिति है .”

73- “ग्रीष्म ऋतु में जब तुम समस्त आकाश को अंतहीन निर्मलता में देखो , उस निर्मलता में प्रवेश करो .”

74- “हे शक्ति , समस्त तेजोमय अंतरिक्ष मेरे सिर में ही समाहित है , ऐसा भाव करो .”

75- “जागते हुए , सोते हुए , अपने को प्रकाश समझो .”

76- “वर्षा की अंधेरी रात में उस अन्धकार में प्रवेश करो , जो रूपों का रूप है .”

77- “जब चंद्रमाहीन वर्षा की रात उपलब्ध  न हो तो आंखें बंद करो और अपने सामने अन्धकार को देखो , फिर आंखें खोलकर अन्धकार को देखो . इस प्रकार दोष सदा के लिए विलीन हो जाते हैं .” 

78- “जहां कहीं भी तुम्हारा अवधान उतरे , उसी बिंदु पर , अनुभव .”

79- “अनुभव करो : मेरा विचार , मैं-पन , आंतरिक इन्द्रियां– मुझ .”

80- “कामना के पहले और जानने के पहले  मैं कैसे कह सकता हूं कि मैं हूं ? विमर्श करो . सौंदर्य में विलीन हो जाओ .” 

81- “भाव करो कि एक आग तम्हारे पांव के अंगूठे  से शुरू होकर पूरे शरीर में ऊपर उठ रही है और अंततः शरीर जलकर राख हो जाता है ; लेकिन तुम नहीं . “

82- ” यह काल्पनिक जगत जलकर राख हो रहा है , यह भाव करो ; और मनुष्य से श्रेष्ठतर प्राणी बनो .”

83- ” जैसे विषयीगत रूप से अक्षर शब्दों में और शब्द वाक्यों में जाकर मिलते हैं और विषयगत रूप से वर्तुल चक्रों में और चक्र मूल तत्व में जाकर मिलते हैं , वैसे ही अंततः इन्हें भी हमारे अस्तित्व में आकर मिलते हुए पाओ .”

84- ” शरीर के प्रति आसक्ति को दूर हटाओ और यह भाव करो कि मैं सर्वत्र हूं . जो सर्वत्र है वो आनंदित है .”

85- ” ना-कुछ का विचार करने से सीमित आत्मा असीम हो जाती है .” ]

86- “भाव करो कि मैं किसी ऐसी चीज का चिंतन करता हूं जो दृष्टि के परे है , जो पकड़ के परे है , जो अनस्तित्व के , न होने के परे है– मैं .”

87- ” मैं हूं . यह मेरा है . यह यह  है . हे प्रिये , ऐसे भाव में भी असीमतः उतरो . “

88- ” प्रत्येक वस्तु ज्ञान के द्वारा ही देखी जाती है . ज्ञान के ही द्वारा आत्मा क्षेत्र में प्रकाशित होती है . उस एक को ज्ञाता और ज्ञेय की भांति देखो . “

89- ” हे प्रिये , इस क्षण में मन ,ज्ञान , प्राण , रूप , सब को समाविष्ट होने दो . “

90- ” आंख की पुतलियों को पंख की भांति छूने से उनके बीच का हल्कापन हृदय में खुलता है और वहां ब्रह्मांड व्याप्त हो जाता है . ”

91- ” हे दयामयी , अपने रूप को बहुत ऊपर और बहुत नीचे , आकाशीय उपस्थिति में प्रवेश करो . “

92- ” चित्त को ऐसी अव्याख्य सूक्ष्मता में अपने हृदय के ऊपर , नीचे और भीतर रखो . ”

93- ” अपने वर्तमान रूप का कोई भी अंग असीमित रूप से विस्तृत जानो . “

94- ” अपने शरीर , अस्थियों , मांस और रक्त को ब्रह्मांडीय सार से भरा हुआ अनुभव करो . “

95- ” अनुभव करो कि सृजन के शुद्ध गुण तुम्हारे स्तनों में प्रवेश करके सूक्ष्म रूप धारण कर रहे हैं . “

96- ” किसी ऐसे स्थान पर वास करो जो अंतहीन रूप से विस्तीर्ण हो . “

97- ” अंतरिक्ष को अपना ही आनंद शरीर मानों . “

98- ” किसी सरल मुद्रा में दोनों काँखों के मध्य-क्षेत्र (वक्षस्थल) में धीरे-धीरे शान्ति व्याप्त होने दो . “

99- ” स्वयं को सभी दिशाओं में परिव्याप्त होता हुआ महसूस करो — सुदूर , समीप . “

100- ” वस्तुओं और विषयों का गुणधर्म ज्ञानी व अज्ञानी के लिए समान होता है . ज्ञानी की महानता यह है कि वह आत्मगत भाव में बना रहता है , वस्तुओं में नहीं खोता . “

101- ” सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान ,सर्वव्यापी मानो . ”

102- ” अपने भीतर तथा बाहर एक साथ आत्मा की कल्पना करो , जब तक कि सम्पूर्ण अस्तित्व आत्मवान न हो जाए . “

103- ” अपनी सम्पूर्ण चेतना से कामना के , जानने के आरंभ में ही , जानो . “

104 – ” हे शक्ति , प्रत्येक आभास सीमित है , सर्वशक्तिमान में विलीन हो रहा  है . “” हे शक्ति , प्रत्येक आभास सीमित है , सर्वशक्तिमान में विलीन हो रहा  है

105- ” सत्य में रूप अविभक्त हैं . सर्वव्यापी आत्मा तथा तुम्हारा अपना रूप अविभक्त हैं . दोनों को इसी चेतना से निर्मित जानो . “

106- हर मनुष्य की चेतना को अपनी ही चेतना जानो . अतः आत्मचिंता को त्यागकर प्रत्येक प्राणी हो जाओ . “

107- यह चेतना ही प्रत्येक प्राणी के रूप में है , अन्य कुछ भी नहीं है . ”

108- ” यह चेतना ही प्रत्येक की मार्गदर्शक सत्ता है , यही हो रहो .”

109- ” अपने निष्क्रिय रूप को त्वचा की दीवारों का एक रिक्त कक्ष मानो– सर्वथा रिक्त . ”

110- ” हे गरिमामयी , लीला करो . यह ब्रह्मांड एक रिक्त खोल है जिसमें तुम्हारा मन अनंत रूप से कौतुक करता है . “

111- ” हे प्रिये , ज्ञान और अज्ञान , अस्तित्व और अनस्तित्व पर ध्यान दो . फिर दोनों को छोड़ दो ताकि तुम हो सको . ”

112- ” आधारहीन , शाश्वत , निश्चल आकाश में प्रविष्ट होओ . “

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