नारद भक्ति सूत्र

अब भक्ति की व्याख्या करेंगे l

वह ईश्वर के प्रति परम प्रेम रूपा है। 

और अमृतस्वरूपा भी है।

जिसको पाकर मनुष्य सिद्ध हो जाता है,अमर हो जाता है,तृप्त हो जाता है।

जिसके प्राप्त होने पर मनुष्य न किसी वस्तु की इच्छा करता है न किसी बिछुड़े व्यक्ति या वस्तु के लिये शोक प्रकट करता है,न द्वेष करता है,न किसी वस्तु में आसक्त होता है और न उसे उत्साह होता है।

जिसको जानकर मनुष्य उन्मत्त हो जाता है,स्तब्ध हो जाता है,आत्माराम बन जाता है।

वह कामनायुक्त नहीं है। क्योंकि वह निरोध स्वरूपा है।

लौकिक और वैदिक कर्मों के त्याग को निरोध कहते हैं।

उस प्रियतम भगवान में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता को भी निरोध कहते है।

दूसरे आश्रयों के त्याग का नाम अनन्यता है।

लौकिक और वैदिक कर्मों में भगवान के अनुकूल कर्म करना उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता है।

दृढ निश्चय हो जाने पर भी भगवान के अनुकूल शास्त्रोक्त कर्म करनें चाहिये ।

अन्यथा पतित हो जानें की शंका है।

बाह्य ज्ञान शेष रहनें तक लौकिक कर्म विधिपूर्वक सम्पन्न होनें चाहिये । भोजनादि कार्य तो शरीर के रहने तक होते रहेंगे।

अब भिन्न भिन्न मतानुसार उसके लक्षण कहे जाते हैं। 

महर्षि पराशर पुत्र व्यासजी के अनुसार भगवान की पूजा में अनुराग का होना भक्ति है।

श्री गर्गाचार्य के अनुसार भगवान की कथा में अनुराग का होना भक्ति है।

महर्षि शाण्डिल्य के अनुसार आत्मरति के अविरोधी विषय में अनुराग का होना भक्ति है।

देवर्षि नारद के अनुसार समस्त कर्मों को भगवान को अर्पण करना और भगवान का थोड़ा भी विस्मरण होनें से परम व्याकुल होना भक्ति है ।

ठीक ऐसा ही है।

जैसे ब्रजगोपियों की भक्ति ।

इस अवस्था में भी महात्म्यज्ञान की विस्मृति का अपवाद नहीं ।

उसके बिना जारों के समान है।

उसमें(जारों के प्रेम में) प्रियतम के सुख से सुखी होना नहीं है।

वह तो कर्म,ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठतर है। 

क्योंकि फलरूपा है।

ईश्वर को भी अभिमान से द्वेष और दैन्य से प्रियता है।

उसका साधन ज्ञान ही है,किन्हीं का यह मत है।

दूसरे आचार्यों का यह मत है कि भक्ति और ज्ञान परस्पर एक दूसरे के आश्रित है।

ब्रह्मकुमारों के मत से भक्ति स्वयं फलरूपा है।

राजगृह और भोजनादि में ऐसा ही देखा जाता है।

न उससे राजा की प्रसन्नता होगी न क्षुधा मिटेगी ।

अतयेव मुक्त होनें की इच्छा रखनेंवालों को भक्ति ही ग्रहण करनी चाहिये।

आचार्यगण उस भक्ति के साधन बतलाते हैं।

वह विषय त्याग और संग त्याग से सम्पन्न होता है।

अखण्ड भजन से सम्पन्न होता है।

लोकसमाज में भी भगवत्-गुण-श्रवण और कीर्तन से सम्पन्न होता है।

मुख्यतः यह महापुरुषों की कृपा से अथवा किं चित भगवत्कृपा से होता है।

महापुरुषों का संग दुर्लभ अगम्य और अमोघ है।

उसकी कृपा से ही महत्पुरुषों का संग भी मिलता है।

भगवान और उनके भक्त में अभेद है अर्थात कोई भेद नहीं है। 

उस की ही साधना करो,उसी की साधना करो ।

दुःसंग का सर्वथा ही त्याग करना चाहिये। 

काम, क्रोध ,मोह,स्मृतिभ्रंश एवं सर्वनाश का कारण है ।

दुःसंग से ये तरंगरूप उत्पन्न होकर भी समुद्र का आकार ग्रहण कर लेते हैं।

कौन तरता है? माया से कौन तरता है? जो ममतारहित पुरुष समस्त संगों का त्याग और महानुभावों की सेवा करता है।

जो निर्जन स्थान में रहता हुआ लौकिक बन्धनों को तोड़कर तीनों गुणों (सत रज तम) से परे जाकर भोग तथा क्षेम का भी परित्याग कर दे ।

जो कर्मफल तथा कर्मों का भी त्याग करता है और अन्ततः द्वन्द्व रहित हो जाता है।

जो वेदों का भी त्याग कर अखण्ड भगवत्प्रेम पा लेता है। 

वह तरता है,वह तरता है,वह लोकों को तार देता है।

प्रेम के स्वरूप का बखान नहीं किया जा सकता । प्रेम का स्वरूप अनिर्वचनीय है ।

गूंगे के स्वाद की तरह है।

किसी किसी योग्य पात्र में ही ऐसा प्रेम प्रकट होता है।

यह (प्रेम) गुण और कामना रहित है। यह प्रतिक्षण बढ़ता है। इसमें विच्छेद नहीं है अर्थात इसकी निरंतरता बनी रहती है । यह सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और अनुभवरूप है।

इसको पाकर प्रेमी इसे ही देखता ,सुनता, वर्णन करता और चिन्तन करता है। 

गौणी भक्ति गुणभेद तथा आर्तादिभेद से तीन प्रकार की होती है।

बाद के क्रमों में पहले के क्रम वाली भक्ति कल्याणकारिणी होती है।

अन्य सब की अपेक्षा भक्ति सुलभ है ।

स्वयं प्रमाणरूप है,इसके लिये अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।

भक्ति शांति और परमानंद स्वरूपा है।

लौकिक और वैदिक कर्मों को भगवान को अर्पण कर चुके भक्त को लोकहानि की चिन्ता नहीं करनी चाहिये।

भक्ति में सिद्धि प्राप्त होने तक लोक व्यवहार का त्याग नहीं करना चाहिये,किन्तु फल का त्याग कर उस भक्ति का साधन करना चाहिये।

स्त्री,धन,नास्तिक और वैरी का चरित्र नहीं सुनना चाहिये।

अभिमान और दम्भ आदि का त्याग कर देना चाहिये। 

भगवान और समस्त आचार समर्पित करनें के बाद भी यदि काम,क्रोध,और अभिमान आदि बचे रह गये तो उन्हें भी भगवान के प्रति ही प्रदर्शित करना चाहिये।

तीन रूपों को भंग कर नित्य दास भक्ति से या नित्य कान्ता भक्ति से प्रेम ही करना चाहिये ,प्रेम ही करना चाहिये ।

एकांत भक्ति ही श्रेष्ठ है।

ऐसे अनन्य भक्त कंठावरोध,रोमांचित और ,अश्रुयुक्त नेत्रवाले परस्पर सम्भाषण करते हुये अपनें कुल और पृथ्वी दोनों को पवित्र करते हैं।

ऐसे भक्त तीर्थों को सुतीर्थ ,कर्मों को सुकर्म,शास्त्रों को सत्शास्त्र कर देते हैं।

 वे तन्मय हैं।

इन्हे देखकर पितृगण प्रमुदित होते हैं देवता नाचते लगते हैं और यह पृथ्वी सनाथा हो जाती है।

उनमें जाति ,विद्या, रूप,कुल,धन और क्रियादि का भेद नहीं है।

क्योंकि वे उनके ही हैं,भगवान के ही हैं।

भक्त को वाद विवाद नहीं , 

क्योंकि वाद-विवाद मे बाहुल्य का अवकाश है और वह अनियत है।

भक्तिशास्त्र का मनन करना चाहिये और ऐसे कर्म भी करने चाहिये जिनसे भक्ति की वृद्धि हो।

सुख-दुख,इच्छा,लाभ आदि का पूर्ण त्याग हो जाये,ऐसे काल की बाट देखते हुये आधा क्षण भी व्यर्थ नहीं बिताना चाहिये ।

अहिंसा, सत्य,शौच,दया,आस्तिकता आदि आचरणीय सदाचारों का भलीभाँति पालन करना चाहिये।

सब समय सर्वभाव से निश्चिंत होकर भगवान का ही भजन करना चाहिये ।

वे भगवान कीर्तित होनें पर शीघ्र ही प्रगट होते हैं और भक्तों को अनुभव करा देते हैं।

यह प्रेमरूपा भक्ति एक होकर भी तीनों कायिक, वाचिक,मानसिक सत्यों में अथवा तीनों कालों में सत्य भगवान की भक्ति ही श्रेष्ठ है,भक्ति ही श्रेष्ठ है।

यह प्रेमरूपा भक्ति एक होकर भी गुण महात्म्यासक्ति,रूपासक्ति,पूजासक्ति,स्मरणासक्ति,दास्यासक्ति,सांख्यासक्ति,कांतासक्ति,वात्सल्यासक्ति,आत्मनिवेदनासक्ति,तत्मयासक्ति और परमविरहासक्ति इस प्रकार से ग्यारह प्रकार की होती है।

सनत्कुमार,व्यास,शुकदेव,शांडिल्य,गर्ग,विष्णु,कौंडिण्ड, शेष , उद्धव ,आरूणि,बलि,हनुमान, विभीषण आदि भक्तितत्व के आचार्यगण लोगों की निंदा-स्तुति का कुछ भी भय न कर सब एकमत से ऐसा कहते हैं कि भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है।

जो इस नारदोक्त शिवानुशासन में विश्वास और श्रृद्धा करते हैं। वे प्रियतम को पाते हैं,वे प्रियतम को पाते हैं।

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