पतंजलि योगसूत्र

  1. अब योग का अनुशासन
  2. NOW THE DISCIPLINE OF YOGA.
  3. योग मन की समाप्ति है।
  4. YOGA IS THE CESSATION OF MIND.
  5. तब साक्षी स्वयं में स्थापित हो जाता है।
  6. THEN THE WITNESS IS ESTABLISHED IN ITSELF.
  7. अन्य अवस्थाओं में मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य हो जाता है।
  8. IN THE OTHER STATES THERE IS IDENTIFICATION WITH THE MODIFICATIONS OF THE MIND.
  9. मन की वृत्तियां पांच हैं।वे क्लेश का स्रोत भी हो सकती हैं और अक्लेश का भी।
  10. THE MODIFICATIONS OF THE MIND ARE FIVE. THEY CAN BE EITHER A SOURCE OF
    ANGUISH OR OF NON-ANGUISH.
  11. ये वृत्तियां हैं प्रमाण(सम्यक ज्ञान),विपर्यय(मिथ्या ज्ञान),विकल्प(कल्पना),निद्रा और स्मृति।
  12. THEY ARE RIGHT KNOWLEDGE, WRONG KNOWLEDGE, IMAGINATION, SLEEP AND
    MEMORY
  13. सम्यक ज्ञान(प्रमाण वृत्ति) के तीन स्रोत हैं,प्रत्यक्ष बोध,अनुमान और बुद्धपुरुषों के वचन|
  14. RIGHT KNOWLEDGE HAS THREE SOURCES: DIRECT COGNITION, INFERENCE AND THE
    WORDS OF THE AWAKENED ONES.
  15. विपर्यय एक मिथ्या ज्ञान है,जो विषय से उस तरह मेल नहीं खाती जैसा वह है।
  16. WRONG KNOWLEDGE IS A FALSE CONCEPTION NOT CORRESPONDING TO THE THING AS
    IT IS.
  17. शब्दों के जोड़ मात्र से बनी एक धारणा जिसके पीछे कोई ठोस वास्तविकता नहीं होती,वह विकल्प है,कल्पना है।
  18. AN IMAGE CONJURED UP BY WORDS WITHOUT ANY SUBSTANCE BEHIND IT IS VIKALPA –
    IMAGINATION.
  19. निद्रा मन की वह वृत्ति है,जो अपनें में किसी विषय वस्तु की अनुपस्थिति पर आधारित होती है।
  20. THE MODIFICATION OF THE MIND WHICH IS BASED ON THE ABSENCE OF ANY CONTENT
    IN IT IS SLEEP.
  21. स्मृति है पिछले अनुभवों का स्मरण करना।
  22. MEMORY IS THE CALLING UP OF PAST EXPERIENCES.
  23. (सतत आन्तरिक)अभ्यास और वैराग्य से इन वृत्तियों की समाप्ति की जाती है।
  24. THEIR CESSATION IS BROUGHT ABOUT BY PERSISTENT INNER EFFORT AND NON-
    ATTACHMENT.
  25. इन दो में,अभ्यास स्वयं में दृढ़ता से प्रतिष्ठित होनें का अभ्यास है।
  26. OF THESE TWO, ABHYASA THE INNER PRACTICE IS THE EFFORT FOR BEING FIRMLY
    ESTABLISHED IN ONESELF
  27. बिना किसी व्यवधान के श्रृद्धा भरी निष्ठा के साथ लगातार लंबे समय तक इसे जारी रखनें से यह दृढ अवस्थावाला हो जाता है।
  28. IT BECOMES FIRMLY GROUNDED ON BEING CONTINUED FOR A LONG TIME, WITHOUT
    INTERRUPTION AND WITH REVERENT DEVOTION.
  29. वैराग्य,निराकांक्षा की “वशीकारसंज्ञा” नामक पहली अवस्था है-ऐंद्रिक सुखों की तृष्णा में,सचेतन प्रयास द्वारा,भोगासक्ति की समाप्ति।
  30. THE FIRST STATE OF VAIRAGYA, DESIRELESSNESS – CESSATION FROM SELF-
    INDULGENCE IN THE THIRST FOR SENSUOUS PLEASURES, WITH CONSCIOUS EFFORT.
  31. वैराग्य,निराकांक्षा की अंतिम अवस्था है-पुरुष के परम आत्मा के अंतरतम स्वभाव को जाननें के कारण समस्त इच्छाओं का विलीन हो जाना।
  32. THE LAST STATE OF VAIRAGYA, DESIRELESSNESS – CESSATION OF ALL DESIRING BY
    KNOWING THE INNERMOST NATURE OF PURUSHA, THE SUPREME SELF.
  33. सम्प्रज्ञात समाधि वह समाधि है जो वितर्क,विचार,आनन्द और अस्मिता के भाव से युक्त होती है।
  34. SAMPRAJNATA SAMADHI IS THE SAMADHI THAT IS ACCOMPANIED BY REASONING,
    REFLECTION, BLISS AND A SENSE OF PURE BEING
  35. असम्प्रज्ञात समाधि में सारी मानसिक क्रिया की समाप्ति होती है,मन केवल अप्रगट संस्कारों को धारण किये रहता है।
  36. IN ASAMPRAJNATA SAMADHI THERE IS A CESSATION OF ALL MENTAL ACTIVITY, AND THE
    MIND ONLY RETAINS UNMANIFESTED IMPRESSIONS.
  37. विदेहियों और प्रृकृतिलयों को असम्प्रज्ञात समाधि उपलब्ध होती है क्योंकि अपनें पिछले जन्म में उन्होंनें अपनें शरीरों के साथ तादात्म्य बनाना समाप्त कर दिया था।वे फिर जन्म लेते हैं क्योंकि इच्छा के बीज बने रहते हैं।
  38. VIDEHAS AND PRAKRITI-LAYAS ATTAIN ASAMPRAJNATA SAMADHI BECAUSE THEY CEASED
    TO IDENTIFY THEMSELVES WITH THEIR BODIES IN THEIR PREVIOUS LIFE. THEY TAKE
    REBIRTH BECAUSE SEEDS OF DESIRE REMAINED.
  39. दूसरे जो असम्प्रज्ञात समाधि को उपलब्ध होते हैं वे श्रृद्धा,वीर्य,(प्रयत्न),स्मृति,समाधि(एकाग्रता) और प्रज्ञा(विवेक) के द्वारा उपलब्ध होते हैं।
  40. OTHERS WHO ATTAIN ASAMPRAJNATA SAMADHI ATTAIN THROUGH FAITH, EFFORT,
    RECOLLECTION, CONCENTRATION AND DISCRIMINATION.
  41. सफलता उनके निकटतम होती है,जिनके प्रयास तीव्र,प्रगाढ और सच्चे होते हैं।
  42. SUCCESS IS NEAREST TO THOSE WHOSE EFFORTS ARE INTENSE AND SINCERE.
  43. प्रयास की मात्रा मृदु ,मध्यम और उच्च होनें के अनुसार सफलता की सम्भावना विभिन्न होती है।
  44. THE CHANCES OF SUCCESS VARY ACCORDING TO THE DEGREE OF EFFORT.
  45. सफलता उन्हें भी उपलब्ध होती है जो ईश्वर के प्रति समर्पित होते हैं।
  46. SUCCESS IS ALSO ATTAINED BY THOSE WHO SURRENDER TO GOD.
  47. ईश्वर सर्वोत्कृष्ट है।वह दिव्य चेतना की वैयक्तिक इकाई है।वह जीवन के दुखों से तथा कर्म और उसके परिणाम से अछूता है।
  48. GOD IS THE SUPREME RULER. HE IS AN INDIVIDUAL UNIT OF DIVINE CONSCIOUSNESS. HE
    IS UNTOUCHED BY THE AFFLICTIONS OF LIFE, ACTION AND ITS RESULT.
  49. ईश्वर में बीज अपनें उच्चतम विस्तार में विकसित होता है।
  50. IN GOD THE SEED IS DEVELOPED TO ITS HIGHEST EXTENT.
  51. समय की सीमाओं के बाहर होनें के कारण वह गुरुओं का गुरू है।
  52. BEING BEYOND THE LIMITS OF TIME HE IS THE MASTER OF MASTERS.
  53. उसे ॐ के रुप में जाना जाता है।
  54. HE IS KNOWN AS AUM.
  55. ॐ को दोहराओ और इस पर ध्यान करो।
  56. REPEAT AND MEDITATE ON AUM
  57. ॐ को दोहराना और उस पर ध्यान करना सारी बाधाओं का विलीनीकरण और एक नव चेतना का जागरण लाता है।
  58. REPEATING AND MEDITATING ON AUM BRINGS ABOUT THE DISAPPEARANCE OF ALL
    OBSTACLES AND AN AWAKENING OF A NEW CONSCIOUSNESS.
  59. रोग,निर्जीवता,संशय(संदेह),प्रमाद,आलस्य,विषयासक्ति,भ्रान्ति,दुर्बलता और अस्थिरता वे हैं जो मन में विक्षेप लाती हैं।
  60. DISEASE, LANGUOR, DOUBT, CARELESSNESS, LAZINESS, SENSUALITY, DELUSION,
    IMPOTENCY AND INSTABILITY ARE THE OBSTACLES THAT DISTRACT THE MIND.
  61. दुख,निराशा,कंपकंपी और अनियमित श्वसन विक्षेपयुक्त मन के लक्षण हैं।
  62. ANGUISH, DESPAIR, TREMORS AND IRREGULAR BREATHING ARE THE SYMPTOMS OF A
    DISTRACTED MIND.
  63. इन बाधाओं को दूर करनें के लिये एक तत्व पर ध्यान करना।
  64. TO REMOVE THESE, MEDITATE ON ONE PRINCIPLE.
  65. आनन्दित व्यक्ति के प्रति मैत्री,दुखी के प्रति करुणा,पुण्यवान के प्रति मुदिता तथा पापी के प्रति उपेक्षा इन भावनाओं का संवर्धन करनें से मन शांत हो जाता है।
  66. THE MIND BECOMES TRANQUIL BY CULTIVATING ATTITUDES OF FRIENDLINESS TOWARDS
    THE HAPPY, COMPASSION TOWARDS THE MISERABLE, JOY TOWARDS THE VIRTUOUS AND
    INDIFFERENCE TOWARDS THE EVIL.
  67. बारी बारी से श्वास बाहर छोड़नें और रोकनें से भी मन शांत होता है।
  68. THE MIND ALSO BECOMES TRANQUIL BY ALTERNATELY EXPELLING AND RETAINING THE
    BREATH.
  69. जब ध्यान से अतीन्द्रिय संवेदना उत्पन्न होती है तो मन आत्मविश्वास प्राप्त करता है और इसके कारण साधना का सातत्य बना रहता है।
  70. WHEN MEDITATION PRODUCES EXTRAORDINARY SENSE PERCEPTIONS, THE MIND GAINS
    CONFIDENCE AND THIS HELPS PERSEVERANCE.
  71. उस आन्तरिक प्रकाश पर भी ध्यान करो जो शांत है और सभी दुखों के बाहर है।
  72. ALSO, MEDITATE ON THE INNER LIGHT WHICH IS SERENE AND BEYOND ALL SORROW.
  73. या जो वीतरागता को उपलब्ध हो चुका हो उसका ध्यान करो।
  74. ALSO MEDITATE ON ONE WHO HAS ATTAINED DESIRELESSNESS.
  75. उस बोध पर भी ध्यान करो,जो निद्रा के समय उतर आता है।
  76. ALSO, MEDITATE ON KNOWLEDGE THAT COMES DURING SLEEP.
  77. ध्यान करो किसी उस चीज पर भी,जो कि तुम्हें आकर्षित करती है।
  78. ALSO, MEDITATE ON ANYTHING THAT APPEALS TO YOU.
  79. इस प्रकार योगी हो जाता है सब का मालिक-अति सूक्ष्म परमाणु से लेकर अपरिसीम तक का।
  80. THUS, THE YOGI BECOMES MASTER OF ALL, FROM THE INFINITESIMAL TO THE INFINITE.
  81. जब मन की क्रिया नियंत्रण में होती है,तब मन बन जाता है,शुद्ध स्फटिक की भांति फिर वह समग्र रुप से प्रतिबिंबित करता है,बोधकर्ता को बोध को और बोध के विषय को।
  82. WHEN THE ACTIVITY OF THE MIND IS UNDER CONTROL, THE MIND BECOMES LIKE
    PURE CRYSTAL, REFLECTING EQUALLY, WITHOUT DISTORTION, THE PERCEIVER, THE
    PERCEPTION AND THE PERCEIVED.
  83. सवितर्क समाधि वह समाधि है ,जहाँ योगी अभी भी वह भेद करनें योग्य नहीं रहता है,जो सच्चे ज्ञान के तथा शब्दों पर आधारित ज्ञान,तर्क या इन्द्रिय-बोध पर आधारित ज्ञान के बीच होता है-जो सब मिश्रित अवस्था में मन में बना रहता है।
  84. SAVITARKA SAMADHI IS THE SAMADHI IN WHICH THE YOGI IS STILL UNABLE TO
    DIFFERENTIATE BETWEEN THE REAL KNOWLEDGE, KNOWLEDGE BASED ON WORDS AND
    KNOWLEDGE BASED ON REASONING OR SENSE PERCEPTIONS, WHICH ALL REMAIN IN
    THE MIND IN A MIXED STATE.
  85. जब स्मृति परिशुद्ध होती है और मन किसी अवरोध के बिना वस्तुओं की यथार्थता को देख सकता है, तब निर्वितर्क समाधि फलित होती है।
  86. NIRVITARKA SAMADHI IS ATTAINED WHEN THE MEMORY IS PURIFIED, AND THE MIND IS
    ABLE TO SEE THE TRUE NATURE OF THINGS WITHOUT OBSTRUCTION.
  87. सवितर्क और निर्वितर्क समाधि का जो स्पष्टीकरण है उसी से समाधि की उच्चतर स्थितियाँ भी स्पष्ट होती हैं,लेकिन सविचार और निर्विचार समाधि की इन उच्चतर अवस्थाओं में ध्यान के विषय अधिक सूक्ष्म होते हैं।
  88. THE EXPLANATIONS GIVEN FOR THE SAMADHIS OF SAVITARKA AND NIRVITARKA, ALSO
    EXPLAIN THE HIGHER STATES OF SAMADHI, BUT IN THESE HIGHER STATES OF SAVICHARA
    AND NIRVICHARA SAMADHIS, THE OBJECTS OF MEDITATION ARE MORE SUBTLE.
  89. इन सूक्ष्म विषयों से सम्बन्धित समाधि का प्रांत सूक्ष्म ऊर्जाओं की निराकार अवस्था तक फैलता है।
  90. THE PROVINCE OF SAMADHI THAT IS CONNECTED WITH THESE FINER OBJECTS EXTENDS
    UP TO THE FORMLESS STAGE OF THE SUBTLE ENERGIES.
  91. ये समाधियाँ जो फलित होती हैं।किसी विषय पर ध्यान करनें से वे सबीज समाधियाँ होती हैं,और आवागमन के चक्र से मुक्त नहीं करती।
  92. THESE SAMADHIS THAT RESULT FROM MEDITATION ON AN OBJECT ARE SAMADHIS WITH
    SEED, AND DO NOT GIVE FREEDOM FROM THE CYCLE OF REBIRTH.
  93. समाधि की निर्विचार अवस्था की परम शुद्धता उपलब्ध होनें पर प्रकट होता है आध्यात्मिक प्रसाद।
  94. ON ATTAINING THE UTMOST PURITY OF THE NIRVICHARA STAGE OF SAMADHI, THERE IS
    A DAWNING OF THE SPIRITUAL LIGHT.
  95. निर्विचार समाधि में चेतना सत्य से,ऋतम्भरा से संपूरित होती है।
  96. IN NIRVICHARA SAMADHI, THE CONSCIOUSNESS IS FILLED WITH TRUTH.
  97. निर्विचार समाधि की अवस्था में विषय-वस्तु की अनुभूति होती है उसके पूरे परिप्रेक्ष्य में,क्योंकि इस अवस्था में ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होता है-इन्द्रियों के प्रयुक्त बिना ही।
  98. IN THE STATE OF NIRVICHARA SAMADHI, AN OBJECT IS EXPERIENCED IN ITS FULL
    PERSPECTIVE, BECAUSE IN THIS STATE KNOWLEDGE IS GAINED DIRECT, WITHOUT THE
    USE OF THE SENSES.
  99. जो प्रत्यक्ष बोध निर्विचार समाधि में उपलब्ध होता है,वह सभी सामान्य बोध संवेदनाओं के पार का होता है-प्रगाढ़ता में भी और विस्तीर्णता में भी।
  100. THE PERCEPTION GAINED IN NIRVICHARA SAMADHI TRANSCENDS ALL NORMAL
    PERCEPTIONS BOTH IN EXTENT AND INTENSITY.
  101. जब सारे नियंत्रण पार कर लिया जाता है,तो निर्बीज समाधि फलित होती है और उसके साथ ही उपलब्ध होती है-जीवन मृत्यु से मुक्तिl
  102. WHEN THIS CONTROLLING OF ALL OTHER CONTROLS IS TRANSCENDED, THE SEEDLESS
    SAMADHI IS ATTAINED, AND WITH IT, FREEDOM FROM LIFE AND DEATH.
  103. साधन पाद- क्रियायोग एक प्रायोगिक,प्राथमिक योग है और वह संघटित हुआ है-सहज संयम(तप),स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण से।
  104. KRIYA-YOGA IS A PRACTICAL, PRELIMINARY YOGA, AND IT IS
    COMPOSED OF AUSTERITY, SELF-STUDY AND SURRENDER TO GOD.
  105. क्रियायोग का अभ्यास क्लेश(दु:ख) को घटा देता है और समाधि की ओर ले जाता है।
  106. THE PRACTICE OF KRIYA-YOGA REDUCES MISERY, AND LEADS
    TOWARDS SAMADHI.
  107. दु:ख उत्पन्न होनें के कारण हैं: जागरूकता की कमी,अहंकार,मोह,घृणा,जीवन से चिपके रहना और मृत्यु भय।
  108. MISERIES ARE CAUSED BY: LACK OF AWARENESS, EGOISM,
    ATTRACTIONS, REPULSIONS, CLINGING TO LIFE AND FEAR OF DEATH.
  109. चाहे वे प्रसुप्तता की,क्षीणता की,प्रत्यावर्तन की या फैलाव की अवस्थाओं में हो,दुख के दूसरे सभी कारण क्रियान्वित होते हैं-जागरूकता के अभाव द्वारा ही।
  110. WHETHER THEY BE IN THE STATES OF DORMANCY, ATTENUATION,
    ALTERATION OR EXPANSION, IT IS THROUGH LACK OF AWARENESS
    THAT THE OTHER CAUSES OF MISERY ARE ABLE TO OPERATE.
  111. अविद्या है-अनित्य को नित्य समझना,अशुद्ध को शुद्ध जानना,पीड़ा को सुख और अनात्म को आत्म जानना।
  112. LACK OF AWARENESS IS TAKING THE TRANSIENT FOR THE ETERNAL,
    THE IMPURE FOR THE PURE, THE PAINFUL AS PLEASURABLE AND THE
    NON-SELF FOR THE SELF.
  113. अस्मिता है दृष्टा का दृश्य के साथ तादात्म्य।
  114. EGOISM IS THE IDENTIFICATION OF THE SEER WITH THE SEEN.
  115. आकर्षण और उसके द्वारा बनी आसक्ति होती है,उस किसी चीज के प्रति जो सुख पहुँचाती है।
  116. ATTRACTION, AND THROUGH IT, ATTACHMENT, IS TOWARDS
    ANYTHING THAT BRINGS PLEASURE.
  117. द्वेष उपजता है किसी उस चीज से जो दुख देती है।
  118. REPULSION IS FROM ANYTHING THAT CAUSES PAIN.
  119. जीवन में से गुजरते हुये मृत्यु-भय है,जीवन से चिपकाव है।यह बात सभी में प्रबल है-विद्वानों में भी।
  120. FLOWING THROUGH LIFE IS THE FEAR OF DEATH, THE CLINGING TO
    LIFE, AND IT IS DOMINANT IN ALL, EVEN THE LEARNED.
  121. पाँचों क्लेशों के मूल कारण मिलायें जा सकते हैं,उन्हें पीछे की ओर उनके उद्गम तक विसर्जित कर देनें से।
  122. THE SOURCES OF THE FIVE AFFLICTIONS CAN BE ABOLISHED BY
    RESOLVING THEM BACKWARDS TO THEIR ORIGIN.
  123. पाँच दुखों की बाह्य अभिव्यक्तियाँ तिरोहित हो जाती हैं-ध्यान के द्वारा।
  124. THE OUTWARD EXPRESSIONS OF THE FIVE AFFLICTIONS DISAPPEAR
    THROUGH MEDITATION.
  125. चाहें वर्तमान में हों या कि भविष्य में,कर्मरत अनुभवों की जड़ें होतीं हैं पाँच क्लेशों में।
  126. WHETHER FULFILLED IN THE PRESENT OR THE FUTURE, KARMIC
    EXPERIENCES HAVE THEIR ROOTS IN THE FIVE AFFLICTIONS.
  127. जब तक जड़ें बनीं रहती हैं,पुनर्जन्म से कर्म की पूर्ति होती है-गुणवत्ता,जीवन का विस्तार और अनुभवों के ढंग द्वारा।
  128. AS LONG AS THE ROOTS REMAIN, KARMA IS FULFILLED IN REBIRTH
    THROUGH CLASS, SPAN OF LIFE, AND TYPES OF EXPERIENCES.
  129. पुण्य लाता है सुख अपुण्य लाता है दुख।
  130. VIRTUE BRINGS PLEASURE; VICE BRINGS PAIN
  131. विवेकपूर्ण व्यक्ति जानता है कि हर चीज दुख की ओर ले जाती है।परिवर्तन के कारण,चिंता के कारण,पिछले अनुभवों के कारण और उन द्वंदों के कारण जो तीन गुणों और मन की पाँच वृत्तियों के बीच में आ बनते हैं।
  132. THE DISCRIMINATING PERSON REALIZES THAT EVERYTHING LEADS
    TO MISERY BECAUSE OF CHANGE, ANXIETY, PAST EXPERIENCE, AND
    THE CONFLICTS THAT ARISE BETWEEN THE THREE ATTRIBUTES AND
    THE FIVE MODIFICATIONS OF THE MIND.
  133. दृष्टा और दृश्य के बीच का संबंध,जो कि दु:ख बनाता है,उसे तोड़ देना है।
  134. FUTURE MISERY IS TO BE AVOIDED.THE LINK BETWEEN THE SEER AND THE SEEN THAT CREATES
    MISERY, IS TO BE BROKEN.
  135. दृश्य,जो कि प्राकृतिक तत्वों से और इन्द्रियों से संघटित होता है,उसका स्वभाव होता है-प्रकाश, थिरता,सक्रियता और निष्क्रियता और दृष्टा को अनुभव उपलब्ध हो तथा अंतत: मुक्ति फलित हो,इस हेतु यह होता है।
  136. THE SEEN WHICH IS COMPOSED OF THE ELEMENTS AND THE SENSE
    ORGANS IS OF THE NATURE OF STABILITY, ACTION, AND INERTIA, AND
    IS FOR THE PURPOSE OF PROVIDING EXPERIENCE AND THUS
    LIBERATION TO THE SEER.
  137. ये तीन गुण प्रकाश,सक्रियता और निष्क्रियता इनकी चार अवस्थायें हैं : निश्चित ,अनिश्चित ,सांकेतिक और अव्यक्त।
  138. THE THREE GUNAS — STABILITY, ACTION, AND INERTIA — HAVE
    FOUR STAGES: THE DEFINED, THE UNDEFINED, THE INDICATED, AND
    THE UNMANIFEST.
  139. दृष्टा यद्यपि शुद्ध चेतना है,फिर भी मन की विकृतियों के माध्यम से देखा करता है।
  140. THE SEER, ALTHOUGH PURE CONSCIOUSNESS, SEES THROUGH THE
    DISTORTIONS OF THE MIND.
  141. दृश्य का अस्तित्व होता है मात्र दृष्टा के लिये।
  142. THE SEEN EXISTS FOR THE SEER ALONE.
  143. यद्यपि दृश्य उसके लिये मृत हो जाता है जिसनें मुक्ति पा ली है।
  144. ALTHOUGH THE SEEN IS DEAD TO HIM WHO HAS ATTAINED
    LIBERATION.
  145. फिर भी बाकी दूसरों के लिये वह जीवित रहता है,क्योकि यह सर्वनिष्ठ होता है।
  146. IT IS ALIVE TO OTHERS BECAUSE IT IS COMMON TO ALL.
  147. दृष्टा और दृश्य साथ साथ होते हैं,ताकि प्रत्येक का वास्तविक स्वभाव जाना जा सके।
  148. THE SEER AND THE SEEN COME TOGETHER SO THAT THE REAL
    NATURE OF EACH MAY BE REALIZED.
  149. इस संयोग का कारण है अविद्या,अज्ञान।
  150. THE CAUSE OF THIS UNION IS IGNORANCE.
  151. अज्ञान के विसर्जन द्वारा द्रष्टा और दृंश्य का संयोग विनष्ट किया जा सकता है। यही मुक्ति का उपाय है।
  152. THE DISASSOCIATION OF THE SEER AND THE SEEN WHICH IS
    BROUGHT ABOUT BY THE DISPERSION OF IGNORANCE IS THE REMEDY
    THAT BRINGS LIBERATION.
  153. सत्य और असत्य के बीच भेद करनें के सतत अभ्यास द्वारा अज्ञान का विसर्जन होता है।
  154. THE UNWAVERING PRACTICE OF DISCRIMINATION BETWEEN WHAT
    IS THE REAL AND WHAT IS THE UNREAL BRINGS ABOUT THE
    DISPERSION OF IGNORANCE.
  155. संबोधि की परम अवस्था उपलब्ध होती है सात चरणों में।
  156. THE HIGHEST STAGE OF ENLIGHTENMENT IS REACHED IN SEVEN
    STEPS.
  157. योग के विभिन्न अंगो के अभ्यास द्वारा अशुद्धि के क्षय होनें से आत्मिक प्रकाश का अविर्भाव होता है,जो कि सत्य का बोध बन जाता है।
  158. BY PRACTISING THE DIFFERENT STEPS OF YOGA FOR THE
    DESTRUCTION OF IMPURITY, THERE ARISES SPIRITUAL ILLUMINATION
    WHICH DEVELOPS INTO AWARENESS OF REALITY.
  159. यम,नियम आसन,प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान और समाधि।
  160. THE EIGHT STEPS OF YOGA ARE: SELF-RESTRAINT, FIXED
    OBSERVANCE, POSTURE, BREATH REGULATION, ABSTRACTION,
    CONCENTRATION, CONTEMPLATION AND TRANCE.
  161. योग के प्रथम चरण यम के अन्तर्गत आते हैं ये।अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह।
  162. SELF-RESTRAINT, THE FIRST STEP OF YOGA, IS COMPRISED OF THE
    FOLLOWING FIVE VOWS: NONVIOLENCE, TRUTHFULNESS, HONESTY,
    SEXUAL CONTINENCE, AND NONPOSSESSIVENESS.
  163. ये पाँच व्रत बनाते हैं एक महाब्रत जो कि फैला हुआ है जाति,स्थान,समय,और स्थिति की सीमाओं से परे संबोधि की सात अवस्थाओं तक।
  164. THESE FIVE VOWS, WHICH CONSTITUTE THE GREAT VOW, EXTEND
    TO ALL THE SEVEN STAGES OF ENLIGHTENMENT REGARDLESS OF
    CLASS, PLACE, TIME, OR CIRCUMSTANCE.
  165. शुद्धता,संतोष,तप, स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण-ये नियम पूरे करनें है।
  166. PURITY, CONTENTMENT, AUSTERITY, SELF-STUDY, AND SURRENDER
    TO GOD ARE THE LAWS TO BE OBSERVED.
  167. जब मन अशांत हो असत् विचारों से,तो मनन करना विपरीत विचारों पर।
  168. WHEN THE MIND IS DISTURBED BY WRONG THOUGHTS, PONDER ON
    THE OPPOSITES.
  169. विपरीत विचारों पर मनन करना आवश्यक है क्योंकि हिंसा आदि विचार,भाव,और कर्म-अज्ञान एवं तीव्र दुख में फलित होते हैं-फिर वे अल्प,मध्यम सा तीव्र मात्राओं के लोभ,क्रोध या मोह द्वारा स्वयं किये हुये,दूसरो से करवाये हुये या अनुमोदन किये हुये क्यूँ ना हों।
  170. IT IS NECESSARY TO PONDER ON THE OPPOSITES BECAUSE WRONG
    THOUGHTS, EMOTIONS, AND ACTIONS, SUCH AS VIOLENCE, RESULT IN
    IGNORANCE AND INTENSE MISERY WHETHER THEY BE PERFORMED,
    CAUSED, OR APPROVED THROUGH GREED, ANGER, OR DELUSION IN
    MILD, MEDIUM, OR INTENSE DEGREES.
  171. जब योगी सुनिश्चित रूप से अहिंसा में प्रतिष्ठित हो जाता है,तब जो उसके सन्निध्य में आते हैं,वे शत्रुता छोड़ देते हैं।
  172. HEN THE YOGI IS FIRMLY ESTABLISHED IN NONVIOLENCE, THERE
    IS AN ABANDONMENT OF ENMITY BY THOSE WHO ARE IN HIS
    PRESENCE.
  173. जब योगी सुनिश्चित रूप से सत्य में प्रतिष्ठित हो जाता है,तब वह विना कर्म किये भी फल प्राप्त कर लेता है।
  174. WHEN THE YOGI IS FIRMLY ESTABLISHED IN TRUTHFULNESS, HE
    ATTAINS THE FRUIT OF ACTION WITHOUT ACTING.
  175. जो योगी सुनिश्चित रूप से अस्तेय में प्रतिष्ठित हो जाता है,तब आन्तरिक समृद्धिया स्वयं उदित होती हैं।
  176. WHEN THE YOGI IS FIRMLY ESTABLISHED IN HONESTY, INNER
    RICHES PRESENT THEMSELVES.
  177. जब योगी निश्छल रूप से ब्रह्मचर्य में प्रतिष्ठित हो जाता है तब तेजस्विता उपलब्ध होती है।
  178. WHEN THE YOGI IS FIRMLY ESTABLISHED IN SEXUAL CONTINENCE,
    VIGOR IS GAINED.
  179. जब योगी सुनिश्चित रूप से अपरिग्रह में प्रतिष्ठित हो जाता हो जाता है,तब अस्तित्व के “कैसे और कहाँ से का ज्ञान उदित होता है।
  180. WHEN THE YOGI IS FIRMLY ESTABLISHED IN NONPOSSESSIVENESS,
    THERE ARISES KNOWLEDGE OF THE “HOW” AND “WHEREFORE” OF
    EXISTENCE.
  181. जब शुद्धता उपलब्ध होती है,तब योगी में स्वयं के शरीर के प्रति एक जुगुप्सा और दूसरों के साथ शारीरिक सम्पर्क में आनें के प्रति अनिच्छा उत्पन्न होती है।
  182. WHEN PURITY IS ATTAINED THERE ARISES IN THE YOGI A DISGUST
    FOR HIS OWN BODY AND A DISINCLINATION TO COME IN PHYSICAL
    CONTACT WITH OTHERS.
  183. मानसिक शुद्धता से उदित होती है-प्रफुल्लता,एकाग्रता की शक्ति,इन्द्रियों पर नियंत्रण और आत्मदर्शन की योग्यता।
  184. FROM MENTAL PURITY THERE ARISES CHEERFULNESS, POWER OF
    CONCENTRATION, CONTROL OF THE SENSES, AND A FITNESS FOR SELF-
    REALIZATION.
  185. संतोष से उपलब्ध होता है परम सुख।
  186. CONTENTMENT BRINGS SUPREME HAPPINESS.
  187. तपश्चर्या अशुद्धियों को मिटा देती है और इस प्रकार हुयी शरीर तथा इन्द्रियों की परिपूर्ण शुद्धि के साथ शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ जाग्रत होती हैं।
  188. AUSTERITIES DESTROY IMPURITIES, AND WITH THE ENSUING
    PERFECTION IN THE BODY AND SENSE ORGANS, PHYSICAL AND
    MENTAL POWERS AWAKEN.
  189. स्वाध्याय के द्वारा दिव्यता के साथ एकत्व घटित होता है।
  190. UNION WITH THE DIVINE HAPPENS THROUGH SELF STUDY.
  191. समाधि का पूर्ण आलोक फलित होता है,ईश्वर के प्रति समर्पण घटित होनें पर।
  192. TOTAL ILLUMINATION CAN BE ACCOMPLISHED BY SURRENDERING
    TO GOD.
  193. स्थिर और सुखपूर्वक बैठना आसन है।
  194. POSTURE SHOULD BE STEADY AND COMFORTABLE.
  195. प्रयत्न की शिथिलता और असीम पर ध्यान से आसन सिद्ध होता है।
  196. POSTURE IS MASTERED BY RELAXATION OF EFFORT AND
    MEDITATION ON THE UNLIMITED.
  197. जब आसन सिद्ध हो जाता है,तव द्वन्दों से उत्पन्न अशांति की समाप्ति हो जाती है।
  198. WHEN POSTURE IS MASTERED THERE IS A CESSATION OF THE
    DISTURBANCES CAUSED BY DUALITIES.
  199. आसन सिद्धि के बाद का चरण है प्राणायाम।यह सिद्धि होती है श्वास प्रश्वास पर कुम्भक करनें से,या अचानक श्वास को रोकनें से।
  200. THE NEXT STEP AFTER THE PERFECTION OF POSTURE IS BREATH
    CONTROL, WHICH IS ACCOMPLISHED THROUGH HOLDING THE
    BREATH ON INHALATION AND EXHALATION, OR STOPPING THE
    BREATH SUDDENLY.
  201. उपरोक्त प्राणायामों की अवधि आवृत देश,काल और संख्या के अनुसार ज्यादा लंबी और सूक्ष्म होती हैं।
  202. THE DURATION AND FREQUENCY OF THE CONTROLLED BREATHS
    ARE CONDITIONED BY TIME AND PLACE, AND BECOME MORE
    PROLONGED AND SUBTLE.
  203. प्राणायाम का चौथा प्रकार आन्तरिक होता है और वह प्रथम तीन के पार जाता है।
  204. THERE IS A FOURTH SPHERE OF BREATH CONTROL, WHICH IS
    INTERNAL, AND IT GOES BEYOND THE OTHER THREE.
  205. तब उस आवरण का विसर्जन हो जाता है जो प्रकाश को ढके हुये है।
  206. THEN COMES THE DISPERSION OF THE COVER THAT HIDES THE
    LIGHT.
  207. और तब मन धारणा के योग्य हो जाता है।
  208. AND THEN THE MIND BECOMES FIT FOR CONCENTRATION.
  209. योग का पाँचवां अंग है प्रत्याहार-स्त्रोत पर लौट आना।यह मन की उस क्षमता की पुनर्स्थापना है जिससे बाह्य जनित विक्षेपों से मुक्त हो इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं।
  210. THE FIFTH CONSTITUENT OF YOGA, pratyahar — RETURNING TO THE
    SOURCE — IS THE RESTORATION OF THE MIND’S ABILITY TO CONTROL
    THE SENSES BY RENOUNCING THE DISTRACTIONS OF OUTSIDE OBJECTS.
  211. फिर समस्त इंद्रियों पर पूर्ण वश हो जाता है।
  212. THEN COMES THE COMPLETE MASTERY OVER ALL THE SENSES.
  213. विभूतिपाद जिस पर ध्यान किया जाता हो उसी में मन को एकाग्र कर देना धारणा है।
  214. DHARANA, CONCENTRATION, IS CONFINING THE MIND TO THE OBJECT
    BEING MEDITATED UPON.
  215. ध्यान के विषय में जुड़ी मन की अविच्छिन्नताओं,उसकी ओर बहता मन का सतत प्रवाह ध्यान है।
  216. DHYAN, CONTEMPLATION, IS THE UNINTERRUPTED FLOW OF THE
    MIND TO THE OBJECT.
  217. जब मन विषय के साथ एक रूप हो जाता है वह समाधि है।
  218. SAMADHI IS WHEN THE MIND BECOMES ONE WITH THE OBJECT.
  219. धारणा,ध्यान और समाधि तीनों का एकत्रीकरण निर्मित करता है संयम को।
  220. THE THREE TAKEN TOGETHER — DHARMA, DHYAN, AND SAMADHI —
    CONSTITUTE SAMYAMA.
  221. उसे वशीभूत करनें से उच्चतर चेतना के प्रकाश का आविर्भाव होता है।
  222. BY MASTERING IT, THE LIGHT OF HIGHER CONSCIOUSNESS.
  223. संयम को चरण दर चरण संयोजित करना होता है।
  224. SAMYAMA IS TO BE EMPLOYED IN STAGES.
  225. धारणा,ध्यान और समाधि-से तीनों चरण प्रारंभिक पाँच चरणों की अपेक्षा आन्तरिक होते हैं।
  226. . THESE THREE — DHARANA, DHYAN, AND SAMADHI — ARE INTERNAL
    COMPARED TO THE FIVE THAT PRECEDE THEM.
  227. लेकिन निर्बीज समाधि की तुलना में ये तीनों बाह्य ही हैं।
  228. BUT THE THREE ARE EXTERNAL COMPARED TO SEEDLESS SAMADHI.
  229. निरोध परिणाम मन का वह रूपान्तरण है जब मन में निरोध की अवस्थिति व्याप्त हो जाती है,जो तिरोहित हो भाव संस्कार उसके स्थान पर प्रकट हो रहे भाव-विचार के बीच क्षणमात्र को घटती है।
  230. NIRODH PARINAM IS THE TRANSFORMATION OF THE MIND IN
    WHICH THE MIND BECOMES PERMEATED BY THE CONDITION OF
    NIRODH, WHICH INTERVENES MOMENTARILY BETWEEN AN
    IMPRESSION THAT IS DISAPPEARING AND THE IMPRESSION THAT IS
    TAKING ITS PLACE.
  231. यह प्रवाह पुनरावृत्त अभूतियों- द्वारा शांत हो जाता है।
  232. THIS FLOW BECOMES PEACEFUL WITH REPEATED IMPRESSIONS.
  233. समाधि परिणाम वह आन्तरिक रूपान्तरण है,जहाँ चित्त को तोड़नें वाली अशांत वृत्तियों का क्रमिक ठहराव आ जाता है और साथ ही साथ एकाग्रता उदित होती है।
  234. SAMADHI PARINAM, THE INNER TRANSFORMATION, IS THE
    GRADUAL SETTLING OF DISTRACTIONS AND THE SIMULTANEOUS
    RISING OF ONE-POINTEDNESS.
  235. एकाग्रता परिणाम वह एकाग्र रूपान्तरण है,चित्त की ऐसी अवस्था है,जहाँ चित्त का विचार विषय जो कि शांत हो रहा होता है,वह अगले ही क्षण ठीक वैसे ही विचार विषय के द्वारा प्रतिस्थापित हो जाता है।
  236. EKAGRATA PARINAM, ONE-POINTED TRANSFORMATION, IS THE
    CONDITION OF THE MIND IN WHICH THE OBJECT OF THE MIND THAT IS
    SUBSIDING IS REPLACED IN THE NEXT MOMENT BY AN EXACTLY
    SIMILAR OBJECT.
  237. जो कुछ अंतिम चार सूत्रों में कहा गया है,उसके द्वारा मूल -तत्वों और इन्द्रियों की विशिष्टताओं,उनके गुण-धर्म और उनकी अवस्थाओं के रूपान्तरणों की व्याख्या भी हो जाती है।
  238. BY WHAT HAS BEEN SAID IN THE LAST FOUR SUTRAS, THE
    PROPERTY, CHARACTER, AND CONDITION TRANSFORMATIONS IN THE
    ELEMENTS AND SENSE ORGANS ARE ALSO EXPLAINED.
  239. चाहे वे सुप्त हों या सक्रिय हों या अव्यक्त हों।सारे गुण-धर्म आधार तत्व में अन्तर्निष्ठ होते हैं।
  240. WHETHER THEY BE LATENT, ACTIVE, OR UNMANIFEST, ALL
    PROPERTIES INHERE IN THE SUBSTRATUM.
  241. आधारभूत प्रक्रिया में छिपी अनेकरूपकता द्वारा रूपान्तरण में कई रूपान्तरण घटित होते हैं।
  242. THE VARIATION IN TRANSFORMATION IS CAUSED BY THE VARIETY
    IN THE UNDERLYING PROCESS.
  243. निराेध,समाधि,एकाग्रता इन तीन प्रकार के रूपान्तरणों में संयम उपलब्ध करनें से अतीत और भविष्य का ज्ञान उपलब्ध होता है।
  244. BY PERFORMING SAMYAMA ON THE THREE KINDS OF
    TRANSFORMATION — NIRODH, SAMADHI AND EKAGRATA —
    KNOWLEDGE OF PAST AND FUTURE.
  245. शब्द और अर्थ और उसमें अन्तर्निहित विचार ,ये सब उलझाव पूर्ण स्थिति में,मन में एक साथ चले आते हैं।शब्द पर संयम पा लेनें से पृथकता घटित होती है और तब किसी भी जीव द्वारा नि:सृत ध्वनियों के अर्थ का व्यापक बोध घटित होता है।
  246. THE SOUND AND THE PURPOSE AND IDEA BEHIND IT ARE
    TOGETHER IN THE MIND IN A CONFUSED STATE. BY PERFORMING
    SAMYAMA ON THE SOUND, SEPARATION HAPPENS AND THERE ARISES
    COMPREHENSION OF THE MEANING OF SOUNDS MADE BY ANY LIVING
    BEING.
  247. अतीतगत संस्कारबद्धताओं का आत्म-साक्षात्कार कर उन्हें पूरी तरह समझनें से पूर्व जन्मों की जानकारी मिल जाती है।
  248. BY OBSERVING PAST IMPRESSIONS, KNOWLEDGE OF PREVIOUS
    BIRTHS IS OBTAINED.
  249. जो प्रतिछवि दूसरों के मन को घेरे रहती है,उसे संयम द्वारा जाना जो सकता है।
  250. THROUGH SAMYAMA THE IMAGE OCCUPYING
    ANOTHER’S MIND CAN BE KNOWN.
  251. लेकिन संयम द्वारा आया बोध उन मानसिक तथ्यों का ज्ञान नहीं करवा सकता जो कि दूसरों के मन की क्षवि -प्रतिक्षवि को आधार देते हैं,क्योंकि वह बात संयम की विषय-वस्तु नहीं होती है।
  252. BUT PERCEPTION THROUGH SAMYAMA
    DOES NOT BRING KNOWLEDGE OF THE MENTAL FACTORS
    THAT SUPPORT THE IMAGE IN ANOTHER’S MIND
    FOR THAT IS NOT THE OBJECT OF SAMYAMA.
  253. ग्राहम शक्ति को हटा देनें के लिये,शरीर के स्वरूप पर संयम सम्पन्न करनें से दृष्टा की आँख और शरीर से उठती प्रकाश-किरणों के बीच संबंध टूट जाता है,और तब शरीर अदृश्य हो जाता है यही नियम शब्द के तिरोहित हो जाने की बात को भी स्पष्ट कर देता है।
  254. BY PERFORMING SAMYAMA ON THE FORM OF THE BODY
    TO SUSPEND RECEPTIVE POWER,
    THE CONTACT BETWEEN THE EYE OF AN OBSERVER
    AND THE LIGHT FROM THE BODY IS BROKEN,
    AND THE BODY BECOMES INVISIBLE.THIS PRINCIPLE ALSO EXPLAINS THE DISAPPEARANCE OF SOUND.
  255. सक्रिय और निष्क्रिय या लक्षणात्मक व विलक्षणात्मक इन दो प्रकार के कर्मों पर संयम पा लेनें के बाद मृत्यु की ठीक ठीक घड़ी की  भविष्य सूचना पाई जा सकती है।
  256. BY PERFORMING SAMYAMA ON THE TWO TYPES OF KARMA, ACTIVE AND DORMANT,
    OR UPON OMENS AND PORTENTS, THE EXACT TIME OF DEATH CAN BE PREDICTED.
  257. मैत्री पर संयम सम्पन्न करनें या अन्य सहज गुण पर संयम करनें से उस गुणवत्ता विशेष में बड़ी सक्षमता आ मिलती है।
  258. BY PERFORMING SAMYAMA ON FRIENDLINESS, OR ANY OTHER ATTRIBUTE, GREAT
    STRENGTH IN THAT QUALITY IS OBTAINED.
  259. हाथी के बल पर संयम निष्पादित करनें से हाथी की सी शक्ति प्राप्त होती है।
  260. BY PERFORMING SAMYAMA ON THE STRENGTH OF AN ELEPHANT, THE STRENGTH OF
    AN ELEPHANT IS OBTAINED.
  261. पराभौतिक मनीषा के प्रकाश को प्रवर्तित करनें से सूक्ष्म का बोध होता है।प्रच्छन्न का और दूरस्थ तत्वों का ज्ञान प्राप्त होता है।
  262. BY DIRECTING THE LIGHT OF THE SUPERPHYSICAL FACULTY, KNOWLEDGE IS GAINED
    OF THE SUBTLE, THE HIDDEN, AND THE DISTANT.
  263. सूर्य पर संयम करनें से सम्पूर्ण सौर-ज्ञान की उपलब्धि होती है।
  264. BY PERFORMING SAMYAMA ON THE SUN, KNOWLEDGE OF THE SOLAR SYSTEM IS
    GAINED.
  265. चंद्र पर संयम करनें से तारों नक्षत्रों की समस्त व्यवस्था का ज्ञान प्राप्त होता है।
  266. BY PERFORMING SAMYAMA ON THE MOON, KNOWLEDGE CONCERNING THE
    ARRANGEMENT OF THE STARS IS GAINED.
  267. धुव नक्षत्र पर संयम करनें से तारों नक्षत्रों की गतिमयता का ज्ञान होता है।
  268. BY PERFORMING SAMYAMA ON THE POLAR STAR, KNOWLEDGE OF THE MOVEMENT
    OF THE STARS IS GAINED.
  269. नाभि चक्र पर संयम करनें से शरीर की सम्पूर्ण संरचना का ज्ञान प्राप्त होता है।
  270. BY PERFORMING SAMYAMA ON THE NAVEL CENTER, KNOWLEDGE OF THE
    ORGANIZATION OF THE BODY IS GAINED.
  271. कंठ पर संयम करनें से क्षुधानु पिपासा की अवभूतियाँ क्षीण हो जाती हैं।
  272. BY PERFORMING SAMYAMA ON THE THROAT, THERE COMES A CESSATION OF THE
    FEELINGS OF HUNGER AND THIRST.
  273. कूर्म नाड़ी पर संयम सम्पन्न करनें से योगी पूर्ण रूपेण थिर हो जाता है।
  274. BY PERFORMING SAMYAMA ON THE NERVE CALLED KURMA-NADHI, THE YOGI IS ABLE
    TO BE COMPLETELY MOTIONLESS.
  275. सिर के शीर्ष भाग के नीचे की ज्योति पर संयम केन्द्रित करनें से समस्त सिद्धों के अस्तित्व से जुड़नें की क्षमता मिल जाती है।
  276. BY PERFORMING SAMYAMA ON THE LIGHT UNDER THE CROWN OF THE HEAD COMES
    THE ABILITY TO CONTACT ALL PERFECTED BEINGS.
  277. प्रतिभा के द्वारा समस्त वस्तुओं का बोध मिल जाता है।
  278. THROUGH PRATIBHA, INTUITION, KNOWLEDGE OF EVERYTHING.
  279. हृदय पर संयम करनें से मन की पृकृति,उसके स्वभावके प्रति जागरूकपकता आ जाती है।
  280. PERFORMING SAMYAMA ON THE HEART BRINGS AWARENESS OF THE NATURE OF
    MIND.
  281. पुरूष सद्चेतना और सत्व सद्वूद्धि के बीच अंतर कर पानें की अयोग्यता  के परिणाम स्वरूप अनुभव के भोग का उदय होता है,यद्यपि ये तत्व नितांत भिन्न हैं।स्वार्थ पर संयम करनें से अन्य ज्ञान से भिन्न पुरूष ज्ञान  उपलब्ध होता है।
  282. EXPERIENCE IS THE RESULT OF THE INABILITY TO DIFFERENTIATE BETWEEN
    PURUSHA, PURE CONSCIOUSNESS, AND SATTVA, PURE INTELLIGENCE, ALTHOUGH THEY
    ARE ABSOLUTELY DISTINCT.
  283. इसके पश्चात अंतर्बोधयुक्त श्रवण,स्पर्श,दृष्टि,आस्वाद और आध्राण की उपलब्धि चली आती है।
  284. FROM THIS FOLLOWS INTUITIONAL HEARING, TOUCHING, SEEING, TASTING, AND
    SMELLING.
  285. ये वे शक्तियाँ हैं जो मन के बाहर होनें से प्राप्त होती हैं,लेकिन ये समाधि के मार्ग पर बाधायें हैं।
  286. THESE ARE POWERS WHEN THE MIND IS TURNED OUTWARD, BUT OBSTACLES IN THE
    WAY OF SAMADHI.
  287. बंधन के कारण का शिथिल पड़ना और संवेदन ऊर्जा भरी प्रवाहिनियों को जानना मन के पर-शरीर में प्रवेश करनें देता है।
  288. LOOSENING THE CAUSE OF BONDAGE AND KNOWING THE CHANNELS ALLOWS THE
    MIND TO ENTER ANOTHER’S BODY.
  289. उदना-ऊर्जा प्रवाहिनी को सिद्ध करनें से,योगी पृथ्वी से ऊपर उठ पाता है और किसी आधार,किसी सम्पर्क के बिना पानी कीचड़,कांटों को पार कर लेता है।
  290. BY MASTERING THE CURRENT UDANA, THE YOGI IS ABLE TO LEVITATE AND PASS
    WITHOUT CONTACT OVER WATER, MIRE, THORSN, ETC.
  291. समान ऊर्जा प्रवाहिनी को सिद्ध करनें से योगी अपनी जठर अग्नि को प्रदीप्त कर सकता है।
  292. BY MASTERING THE CURRENT SAMANA, THE YOGI IS ABLE TO CAUSE HIS GASTRIC
    FIRE TO BLAZE
  293. आकाश और कान के बीच के संबंध पर संयम ले आनें से परा-भौतिक श्रवण उपलब्ध होता है।
  294. BY PERFORMING SAMYAMA ON THE RELATIONSHIP BETWEEN THE ETHER AND THE
    EAR, SUPERPHYSICAL HEARING BECOMES AVAILABLE.
  295. शरीर और आकाश के संबंध पर संयम ले आनें से और साथ ही भार-विहीन चीजों जैसे रूई आदि से अपना तादात्म्य बना लेनें से योगी आकाशगामी हो सकता है।
  296. BY PERFORMING SAMYAMA ON THE RELATIONSHIP BETWEEN THE BODY AND THE
    ETHER AND AT THE SAME TIME IDENTIFYING HIMSELF WITH LIGHT THINGS, LIKE COTTON
    DOWN, THE YOGI IS ABLE TO PASS THROUGH SPACE.
  297. चेतना के आयाम को संस्पर्शित करनें की शक्ति मनस शरीर के परे है,अत: अकल्पनीय है,महाविदेह कहलाती है।..इस शक्ति के द्वारा प्रकाश पर छाया हुआ आवरण हट जाता है।
  298. THE POWER OF CONTACTING THE STATE OF CONSCIOUSNESS
    WHICH IS OUTSIDE THE MENTAL BODY
    AND THEREFORE INCONCEIVABLE
    IS CALLED MAHAVIDEHA.THROUGH THIS POWER
    THE COVERING OF THE LIGHT IS DESTROYED.
  299. उनके स्थूल,सतत,सूक्ष्म,सर्वव्यापी और क्रियाशील स्वरूप पर सम्पन्न हुआ संयम,पंचमहाभूतों,पाँच तत्वों पर आधिपत्य ले आता है।
  300. PERFORMING SAMYAMA ON THEIR GROSS, CONSTANT,
    SUBTLE, ALL-PERVADING, AND FUNCTIONAL STATE
    BRINGS MASTERY OVER THE PANCHABHUTAS —
    THE FIVE ELEMENTS.
  301. इसके उपरांत अणिमा आदि,देह की सम्पूर्णता और देह को बाधित करनें वाले तत्वों के निर्मूलन की उपलब्धि प्राप्त होती है।
  302. FROM THIS FOLLOWS THE ATTAINMENT OF ANIMA, ETC.,
    PERFECTION OF THE BODY, AND
    THE REMOVAL OF THE ELEMENTS’ POWER TO OBSTRUCT THE BODY.
  303. सौंदर्य,लावण्य,शक्ति और वज्र सी कठोरता,ये सभी मिल कर सम्पूर्ण देह का निर्माण करती हैं।
  304. BEAUTY, GRACE, STRENGTH, AND ADAMANTINE HARDNESS
    CONSTITUTE THE PERFECT BODY.
  305. उस बोध की शक्ति,वास्तविक स्वरूप,अस्मिता,सर्वव्यापकता और क्रियाकलापों पर संयम साधनें से ज्ञानेंद्रियों पर स्वामित्व उपलब्ध हो जाता है।
  306. PERFORMING SAMYAMA ON THEIR POWER OF COGNITION,
    REAL NATURE, EGOISM, ALL-PERVASIVENESS, AND FUNCTIONS
    BRINGS MASTERY OVER THE SENSE ORGANS.
  307. इसके उपरांत देह के उपयोग के विना ही तत्क्षण बोध और प्रधान(पौद्गलिक जगत)पर पूर्ण स्वामित्व उपलब्ध हो जाता है।
  308. FROM THIS FOLLOWS INSTANTANEOUS COGNITION
    WITHOUT THE USE OF THE BODY,
    AND COMPLETE MASTERY OVER PRADHANA, THE MATERIAL WORLD.
  309. सत्व और पुरूष का विभेद बोध होनें के उपरान्त ही अस्तित्व की समस्त दशाओं का ज्ञान और उन पर प्रभुत्व उदित होता है।
  310. ONLY AFTER THE AWARENESS OF THE DISTINCTION BETWEEN SATTVA
    AND PURUSHA DOES SUPREMACY AND KNOWLEDGE ARISE OVER ALL
    STATES OF EXISTENCE.
  311. इन शक्तियों से भी अनासक्त होनें से,बंधन का बीज नष्ट हो जाता है,तब आता है कैवल्य,मोक्ष।
  312. BY BEING NONATTACHED TO EVEN THESE POWERS,
    THE SEED OF BONDAGE IS DESTROYED.
    THEN FOLLOWS KAIVALYA, LIBERATION.
  313. तब विभिन्न तलों की अधिष्ठाता,अधिभौतिक सत्ताओं के द्वारा भेजे गये निमंत्रणों के प्रति आसक्ति या उन पर गर्व से बचना चाहिये,क्योंकि यह अशुभ के पुनर्जीवन की संभावना लेकर आयेगा।
  314. THERE SHOULD BE AN AVOIDANCE OF ANY ATTACHMENT OR PRIDE TO
    INVITATIONS FROM THE SUPERPHYSICAL ENTITIES
    IN CHARGE OF VARIOUS PLANES
    BECAUSE THIS WOULD BRING THE POSSIBILITY
    OF THE REVIVAL OF EVIL.
  315. वर्तमान क्षण पर संयम साधनें से क्षण विलीन हो जाता है,और आनें वाला क्षण परम तत्व के बोध से जन्मे ज्ञान को लेकर आता है।
  316. PERFORMING SAMYAMA ON THE PRESENT MOMENT,
    THE MOMENT GONE, AND THE MOMENT TO COME BRINGS
    KNOWLEDGE BORN OF THE AWARENESS OF THE ULTIMATE REALITY.
  317. इससे वर्ग,चरित्र या स्थान से न पहचानें जा सकनें वाली समान वस्तुओं में विभेद की योग्यता आती है।
  318. FROM THIS COMES THE ABILITY TO DISTINGUISH
    BETWEEN SIMILAR OBJECTS WHICH CANNOT BE IDENTIFIED
    BY CLASS, CHARACTER, OR PLACE.
  319. यथार्थ के बोध से उत्पन्न उच्चतम ज्ञान,सारी वस्तुओं और प्रक्रियाओं के भूत,भविष्य और वर्तमान से संबंधित समस्त विषयों की तत्क्षण पहचान के परे है और यह वैश्विक प्रक्रिया का अतिक्रमण कर लेता है।
  320. THE HIGHEST KNOWLEDGE BORN OF THE AWARENESS OF REALITY
    IS TRANSCENDENT,
    INCLUDES THE COGNITION OF ALL OBJECTS SIMULTANEOUSLY, PERTAINS
    TO ALL OBJECTS AND PROCESSES WHATSOEVER — IN THE PAST, THE
    PRESENT, AND THE FUTURE AND TRANSCENDS THE WORLD PROCESS.
  321. जब पुरूष और सत्व के मध्य शुद्धता में साम्य होता है,तभी कैवल्य उपलब्ध हो जाता है।
  322. LIBERATION IS OBTAINED WHEN THERE IS EQUALITY OF PURITY
    BETWEEN THE PURUSHA AND SATTVA.
  323. कैवल्यपाद-सिद्धियाँ जन्म के समय प्रकट होती हैं,इन्हें औषधियों से,मन्त्र के जाप से,तपश्चर्याओं से या समाधि से भी अर्जित किया जा सकता है।
  324. THE POWERS ARE REVEALED AT BIRTH, OR ACQUIRED THROUGH DRUGS, REPEATING
    SACRED WORDS, AUSTERITIES, OR SAMADHI
  325. एक वर्ग,प्रजाति या वर्ण से अन्य में रूपान्तरण,प्राकृतिक प्रवृत्तियों या क्षमताओं के अतिरेक से होता है।
  326. THE TRANSFORMATION FROM ONE CLASS, SPECIES, OR KIND, INTO ANOTHER, IS BY
    THE OVERFLOW OF NATURAL TENDENCIES OF POTENTIALITIES.
  327. आकस्मिक कारक प्राकृतिक प्रवृत्तियों को सक्रिय होनें के लिये प्रेरित नहीं करता,यह तो बस अवरोधों को हटा देता है-जैसे खेत खीचता हुआ किसान;वह बाधाओं को हटा देता है और तब पानी स्वत: ही मुक्त होकर प्रवाहित होनें लगता है।
  328. THE INCIDENTAL CAUSE DOES NOT STIR THE NATURAL TENDENCIES INTO ACTIVITY; IT
    MERELY REMOVES THE OBSTACELS – LIKE A FARMER IRRIGATING A FIELD: HE REMOVES
    THE OBSTACLES, AND THEN THE WATER FLOWS FREELY BY ITSELF.
  329. कृत्रिमता से निर्मित मन केवल अस्मिता से ही अग्रसर होते हैं।
  330. ARTIFICIALLY CREATED MINDS PROCEED FROM EGOISM ALONE.
  331. कृत्रिम मानों की गतिविधियाँ भिन्न भिन्न होती हैं,फिर भी एक मूल मन उन सभी का नियंत्रण करता है।
  332. THOUGH THE ACTIVITIES OF THE MANY ARTIFICIAL MINDS VARY, THE ONE ORIGINAL
    MIND CONTROLS THEM ALL.
  333. केवल ध्यान से जन्मा मौलिक मन ही इच्छाओं से मुक्त होता है।
  334. ONLY THE ORIGINAL MIND WHICH IS BORN OF MEDITATION IS FREE FROM DESIRES.
  335. योगी के कर्म न शुद्ध होते हैं,न अशुद्ध लेकिन अन्य सभी कर्म त्रि-आयामी होते हैं-शुद्ध,अशुद्ध और मिश्रित।
  336. THE YOGI’S KARMAS ARE NEITHER PURE NOR IMPURE, BUT ALL OTHERS ARE THREE-
    FOLD: PURE, IMPURE AND MIXED.
  337. जब उनकी पूर्णता के लिये परिस्थिति सहायक होती हैं तो कर्मों से इच्छायें उठती हैं।
  338. DESIRES ARISE FROM THESE THREE-FOLD KARMAS WHEN CIRCUMSTANCES ARE
    FAVORABLE FOR THEIR FULFILLMENT.
  339. क्योंकि स्मृति और संस्कार समान रूप में ठहरते हैं,इसलिये कारण और प्रभाव का नियम जारी रहता है,भले ही वर्ण,स्थान,समय में उनमें अंतर हो।
  340. BECAUSE MEMORIES AND IMPRESSIONS RETAIN THE SAME FORM, THE RELATIONSHIP
    OF CAUSE AND EFFECT CONTINUES, EVEN THOUGH SEPARATED BY CLASS, LOCALITY,
    AND TIME.
  341. और इस प्रक्रिया का कोई प्रारंभ नहीं है,जैसे कि जीनें की इच्छा शाश्वत होती है।
  342. AND THERE IS NO BEGINNING TO THIS PROCESS, AS THE DESIRE TO LIVE IS ETERNAL.
  343. प्रभाव के कारण पर अवलम्बन होनें से,कारणों के मिटते ही प्रभाव तिरोहित हो जाते हैं।
  344. BEING BOUND TOGETHER AS CAUSE-EFFECT, THE EFFECTS DISAPPEAR WITH THE
    DISAPPEARANCE OF CAUSES.
  345. अतीत और भविष्य का अस्तित्व वर्तमान में है,किन्तु वर्तमान में उनकी अनुभूति नहीं हो पाती है,क्योकि वे विभिन्न तलों पर होते हैं।
  346. PAST AND FUTURE EXIST IN THE PRESENT, BUT THEY ARE NOT EXPERIENCED IN THE
    PRESENT BECAUSE THEY ARE ON IDFFERENT PLANES.
  347. वे व्यक्त हों या अव्यक्त अतीत,वर्तमान और भविष्य सत ,रज और तम गुणों की प्रकृति हैं।
  348. WHETHER MANIFEST OR UNMANIFEST, THE PAST, THE PRESENT AND THE FUTURE
    ARE OF THE NATURE OF GUNAS: STABILITY, ACTION AND INERTIA.
  349. किसी वस्तु का सारतत्व,इन्हीं गुणों के अनुपातों के अनूठेपन में निहित होता है।
  350. THE ESSENCE OF ANY OBJECT CONSISTS IN THE UNIQUENESS OF THE PROPORTIONS
    OF THE THREE GUNAS.
  351. भिन्न भिन्न मनों के द्वारा एक ही वस्तु विभिन्न ढंगों से देखी जाती है।
  352. THE SAME OBJECT IS SEEN IN DIFFERENT WAYS BY DIFFERENT MINDS.
  353. वस्तु एक मन पर ही निर्भर नहीं है।
  354. AN OBJECT IS NOT DEPENDENT ON ONE MIND.
  355. वस्तु का ज्ञान या अज्ञान इस पर निर्भर होता है कि मन उसके रंग में रंगा है या नहीं।
  356. AN OBJECT IS KNOWN OR UNKNOWN DEPENDING ON WHETHER THE MIND IS
    COLORED BY IT OR NOT.
  357. मन की वृत्तियों का ज्ञान सदैव इसके प्रभु,पुरूष,को शुद्ध चेतना के सातत्य  के कारण होता है।
  358. THE MODIFICATIONS OF THE MIND ARE ALWAYS KNOWN BY ITS LORD, DUE TO THE
    CONSTANCY OF THE PURUSA, PURE CONSCIOUSNESS.
  359. मन स्व प्रकाशित नहीं है,क्योंकि स्वयं इसका प्रत्यक्षीकरण हो जाता है।
  360. THE MIND IS NOT SELF-ILLUMINATING, BECAUSE IT IS ITSELF PERCEPTIBLE.
  361. मन के लिये अपनें आप को और किसी अन्य वस्तु को उसी समय में जानना असंभव है।
  362. IT IS IMPOSSIBLE FOR THE MIND TO KNOW ITSELF AND ANY OTHER OBJECT AT THE
    SAME TIME.
  363. यदि मान लिया जाये कि दूसरा मन को प्रकाशित करता है,तो बोध के बोध की कल्पना करनी पड़ेगी और इससे स्मृतियों का संशय उत्पन्न होगा।
  364. IF IT WERE ASSUMED THAT A SECOND MIND ILLUMINATES THE FIRST, COGNITIION OF
    COGNITION WOULD ALSO HAVE TO BE ASSUMED, AND A CONFUSION OF MEMORIES.
  365. आत्म-बोध से अपनी स्वयं की प्रृकृति का ज्ञान मिल जाता है और जब चेतना इस रूप में आ जाती है तो यह एक स्थान से दूसरे स्थान को नहीं जाती।
  366. KNOWLEDGE OF ITS OWN NATURE THROUGH SELF-COGNITION IS OBTAINED WHEN
    CONSCIOUSNESS ASSUMES THAT FORM IN WHICH IT DOES NOT PASS FROM PLACE TO
    PLACE.
  367. जब मन ज्ञाता और ज्ञेय के रंग में रंग जाता है,तब यह सर्वज्ञ हो जाता है।
  368. WHEN THE MIND IS COLORED BY THE KNOWER AND THE KNOWN, IT IS ALL-
    APPREHENDING.
  369. यद्यपि मन असंख्य वासनाओं के रंग में रंगता है,फिर भी मन लगातार उनकी पूर्ति हेतु कार्य करता है,इसके लिये यह सहयोग से कार्य करता है।
  370. THOUGH VARIEGATED BY INNUMERABLE DESIRES, THE MIND ACTS FOR ANOTHER,
    FOR ITS ACTS IN ASSOCIATION.
  371. जब व्यक्ति विशेष को देख लेता है,तो उसकी आत्मभाव की भावना मिट जाती है।
  372. WHEN ONE HAS SEEN THIS DISTINCTION, THERE IS A CESSATION OF DESIRE FOR
    DWELLING IN THE ATMA, THE SELF.
  373. तब विवेक उन्मुख चित्त कैवल्य की ओर आकर्षित हो जाता है।
  374. THEN THE MIND IS INCLINED TOWARDS DISCRIMINATION, AND GRAVITATES TOWARDS
    LIBERATION.
  375. पूर्व के संस्कारों के बल के माध्यम से विवेक ज्ञान के अन्तराल में अन्य प्रत्ययों,अवधारणाओं का उदय होता है।इनका निराकरण भी अन्य मनस्तापों की भाँति किया जाना चाहिये।
  376. IN BREAKES OF DISCRIMINATION, OTHER PRATYAYAS, CONCEPTS, ARISE THROUGH
    THE FORCE OF PREVIOUS IMPRESSIONS. THESE SHOULD BE REMOVED IN THE SAME
    WAY AS OTHER AFFLICTIONS.
  377. उन प्रत्ययों,अवधारणाओं से निवृत हो जाना क्लेशों से निवृत्ति के समान कहा गया है।
  378. IN BREAKES OF DISCRIMINATION, OTHER PRATYAYAS, CONCEPTS, ARISE THROUGH
    THE FORCE OF PREVIOUS IMPRESSIONS. THESE SHOULD BE REMOVED IN THE SAME
    WAY AS OTHER AFFLICTIONS.
  379. वह जिसमें समाधि की सर्वोच्च अवस्थाओं के प्रति भी इच्छारहितता का सातत्य बना हुआ है और जो विवेक के चरम का प्रवर्तन करनें में समर्थ है,उस अवस्था में प्रविष्ट हो जाता है जिसे धर्ममेघ समाधि कहा जाता है।
  380. ONE WHO IS ABLE TO MAINTAIN A CONSTANT STATE OF DE3SIRELESSNESS EVEN
    TOWARDS THE MOST EXALTED STATES OF ENLIGHTENMENT, AND IS ABLE TO EXERCISE
    THE HIGHEST KIND OF DISCRIMINATION, ENTERS THE STATE KNOWN AS ’THE CLOUD
    WHICH SHOWERS VIRTUE’
  381. तब क्लेशों एवं कर्मों से मुक्ति हो जाती है।
  382. THEN FOLLOWS FREEDOM FROM AFFLICTIONS AND KARMAS.
  383. जब सभी मल रूप आवरण,विकृतियाँ और अशुद्धियाँ हट जाती हैं,तब वह सभी कुछ जो मन से जाना जा सकता है,समाधि से प्राप्त असीम ज्ञान की तुलना में अत्यल्प हो जाता है।
  384. THAT WHICH CAN BE KNOWN THROUGH THE MIND IS VERY LITTLE COMPARED
    WITH THE INFINITE KNOWLEDGE OBTAINED IN ENLIGHTENMENT, WHEN THE VEILS,
    DISTORTIONS, AND IMPURITIES ARE REMOVED.
  385. अपनें उद्देश्य को पूर्ण कर लिये जानें के कारण तीनों गुणों में परिवर्तन की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है।
  386. HAVING FULFILLED THEIR OBJECT, THE PROCESS OF CHANGE IN THE THREE GUNAS
    COMES TO AN END.KRAMAHA, THE PROCESS, IS THE SUCCESSION OF CHANGES THAT OCCUR FROM
    THE MOMENT TO MOMENT WHICH BECOME APPREHENSIBLE AT THE FINAL END OF THE
    TRANSFORMATIONS OF THE THREE GUNAS.
  387. कैवल्य समाधि की अवस्था है,जो पुरूषार्थ से शून्य हुये गुणों के अपनें कारण में लीन होनें पर उपलब्ध होती है।
  388. KAIVALYA IS THE STATE OF ENLIGHTENMENT THAT FOLLOWS THE REMERGENCE OF
    THE GUNAS, DUE TO THEIR BECOMING DEVOID OF THE OBJECT OF THE PURUSA.
  389. इस अवस्था में पुरूष अपनें यथार्थ स्वरूप में जो शुद्ध चेतना है,प्रतिष्ठित हो जाता है,यही कैवल्य है।
  390. IN THIS STATE, THE PURUSA IS ESTABLISHED IN HIS REAL NATURE, WHICH IS PURE
    CONSCIOUSNESS.

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