
इससे पहले कि पंच विकारों से आविष्ट होऊँ,
मैनें पंच भावनाओं का अभ्यास कर के जीवन धन्य कर लिया।
इससे पहले कि मैं वासना से आविष्ट होऊं,
मैंनें उनको देवी समझकर चरण छू लिये।
इससे पहले कि मैं क्रोध से आविष्ट होऊँ,
मैंनें उनको करूणामयी निगाहें डालकर मुक्तकर दिया।
इससे पहले कि मैं लोभ से आविष्ट होऊँ,
मैंनें जीभर सब लुटा दिया जो भी मेरे पास था।
इससे पहले कि मैं मोह से आविष्ट हो जाऊँ,
मैंनें उनकी स्वतन्त्रता का आदर करके मुक्त कर दिया।
इससे पहले कि अहंकार से आविष्ट हो जाऊँ,
सब कुछ परमात्मा का प्रसाद समझकर समर्पण कर दिया।
स्वामी आशुतोष।