तुम और तुम्हारे लोग

मैंनें जब जब असभ्यों से तुम्हारे सत्य को कहनें की कोशिश की,
उन्होंनें लकड़ी की लाठियां दिखाकर के मुझे अपमानित कर दिया|

मैंनें जब जब सभ्यों से तुम्हारे सत्य को कहनें की कोशिश की,
उन्होंनें तर्क की लाठियां दिखाकर के मुझे अपमानित कर दिया|

मैंने जब जब तुमसे आयी प्रेम की किरणों को प्रेयसी तक पहुँचानें की कोशिश की,
उन्होंनें मुझे धन,पद और प्रतिष्ठा की नजरों से देखकर अपमानित कर दिया।

मैंनें जब जब तुम्हारे हृदय के संगीत को लोगों तक पहुँचानें की कोशिश की,
उन्होंनें मुझे जाति,सम्प्रदाय,भाषा और ज्ञान की नजरों से देखकर मुझे अपमानित कर दिया।

मैंनें जब जब तुम्हारे लोगों को काव्य की सौम्य नजरों से देखनें की कोशिश की,
उन्होंनें मुझे तर्क की भयानक नजरों से देखकर मुझे अपमानित कर दिया।

मैंनें जब जब तुम्हारे लोगों के इहलौकिक जीवन को दिव्य करनें की कोशिश की,
उन्होंनें पारलौकिक जीवन में तुम्हारे अस्तित्व को स्वीकार करके मुझे अपमानित कर दिया,

मैंने जब जब तुम्हारे लोंगों से प्रकृति को प्रेम करनें की बात कहनें की कोशिश की,
उन्होंनें तुझ एकमात्र पुरुष रुप ईश्वर की चर्चा करके मुझे अपमानित कर दिया||

🙏🏻स्वामी आशुतोष🙏🏻

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