तंत्र कहता है कि जीवन की नदी के साथ संघर्ष मत करो, तैरो नहीं; बल्कि उसकी धारा में अपने को छोड़ दो और बहो।

तंत्र कहता है कि जीवन की नदी के साथ संघर्ष मत करो, तैरो नहीं; बल्कि उसकी धारा में अपने को छोड़ दो और बहो। लेकिन अनुभव कहता है कि अति यंत्रीकरण और भाग—दौड़ से भरा आधुनिक शहरी जीवन शारीरिक और मानसिक तलों पर निरंतर तनाव और थकान पैदा करता है। इसके प्रति तंत्र की क्‍या दृष्‍टि है? क्‍या अनावश्‍यक भाग—दौड़ से बचना अच्‍छा नहीं है?

जीवन सदा ही ऐसा रहा है—चाहे आधुनिक हो या आदिम। उसमें तनाव हैं, चिंताएं हैं। विषय बदल जाते हैं, लेकिन आदमी वही का वही रहता है। दो हजार साल पहले तुम बैलगाड़ी चलाते थे, अब तुम कार चला रहे हो, लेकिन चालक वही है। बैलगाड़ी बदल गई, चीजें बदल गईं;तुम कार चला रहे हो। लेकिन चालक नहीं बदला है, वह वही है। वह अपनी बैलगाड़ी के लिए चिंतित था, तनावग्रस्त था; अब तुम अपनी कार के लिए चिंतित हो, तनावग्रस्त हो। विषय बदल जाते हैं, लेकिन मन वही रहता है।

तो ऐसा मत सोचो कि आधुनिक जीवन के कारण तुम इतने चिंताग्रस्त हो। उसका कारण तुम हो, आधुनिक जीवन नहीं। और तुम कहीं भी, किसी भी सभ्यता में चिंतित ही रहोगे। कुछ दिन के लिए, दो—तीन दिन के लिए तुम गांव चले जाओ। कुछ समय वहा तुम्हें अच्छा लगेगा,क्योंकि रोगों को भी समायोजित होना पड़ता है। तीन दिन के भीतर तुम गांव के साथ समायोजित हो जाओगे, और तब चिंताएं फिर सिर उठाने लगेंगी, उपद्रव फिर खड़े होने लगेंगे। अब कारण तो वही नहीं रहे, लेकिन तुम वही हो।

कभी—कभी ऐसा होता है कि तुम शहर के यातायात के कारण, शोरगुल के कारण परेशान हो जाते हो, और कहते हो कि इतनी भीड़भाड़ और शोरगुल के कारण मुझे रात में नींद नहीं आ पाती। तो गांव चले जाओ, और वहां भी नींद नहीं आएगी, क्योंकि वहा भीड़भाड़ नहीं है, शोरगुल नहीं है। तुम्हें शहर लौट आना पड़ेगा, क्योंकि गांव मुर्दा मालूम पड़ता है, उसमें जीवन नहीं है।

लोग मुझे अक्सर अपने ऐसे अनुभव सुनाते हैं। मैंने एक मित्र को काश्मीर जाने को,पहलगांव जाने को कहा। उसने लौटकर मुझे बताया कि वहां की जिंदगी बहुत नीरस है, वहां जिंदगी ही नहीं है। तुम वहां एक—दो दिन पहाडियों और घाटियों का आनंद लोगे, और उसके बाद ऊब जाओगे। वह आदमी मुझे कहा करता था कि शहर की जिंदगी में मेरा सिर चकराने लगता है, और वही अब कहता है कि वे पहाड़ ऊब पैदा करने लगे और मैं घर लौट आने के लिए आतुर हो उठा।

तुम समस्या हो, काश्मीर कोई मदद नहीं कर सकेगा। बंबई या लंदन या न्यूयार्क तुम्हें नहीं बेचैन करते हैं; बेचैनी का कारण तुम हो। लंदन ने तुम्हें नहीं बनाया; तुमने लंदन को बनाया है। यह यातायात, यह शोरगुल, यह पागल भाग—दौड़, सब तुम्हारी निर्मिति हैं; तुम जैसे लोगों की कृतियां हैं। देखो, कारण तुम्हारे भीतर है। ऐसा नहीं है कि तुम शोरगुल के कारण तनावग्रस्त हो;तुम्हारे तनावग्रस्त होने के कारण शोरगुल है; तुम उसके बिना नहीं रह सकते। तुम्हें उसकी जरूरत है, तुम उसके बिना नहीं जी सकते।

और गांवों में लोग अलग दुखी हैं। वे बंबई या न्यूयार्क या लंदन भागने को आतुर हैं। जैसे ही उन्हें मौका मिलता है, वे भागते हैं। और मैं उन लोगों को भी सुनता रहा हूं जो गांव के सुंदर जीवन की चर्चा करते रहते हैं; लेकिन वे किसी गांव में जाकर नहीं रहते। वे कभी वहां जाकर रहने को राजी नहीं हैं; लेकिन वे गांव की बातें बहुत करते हैं। तुम्हें कौन रोकता है? जाते क्‍यों नहीं? जंगल चले जाओ; कौन रोकता है?

 तुम्हें वह पसंद नहीं आएगा; तुम पसंद नहीं कर सकते। शुरू के कुछ दिन वह तुम्हें अच्छा लगेगा—बदलाहट के कारण। और फिर? फिर तुम ऊब जाओगे। तुम्हें सब फीका—फीका मालूम पड़ेगा; तुम वहां से भागना चाहोगे।

नगर का जीवन तुम्हारे विक्षिप्त मन ने निर्मित किया है। तुम इन नगरों के कारण पागल नहीं हो रहे हो; तुम्हारे पागल मन के कारण ये नगर बने हैं। वे तुम्हारे लिए बने हैं। तुमने उन्हें बनाया है, और वे तुम्हारे लिए हैं। और जब तक यह पागल मन नहीं बदलता है, ये नगर विदा नहीं होंगे। ये रहेंगे; ये तुम्हारी उप—उत्पत्ति हैं।

एक बात स्मरण रहे : जब भी तुम्हें लगे कि कोई चीज गलत है तो पहले उसका कारण अपने भीतर खोजो, और कहीं मत जाओ। सौ में निन्यानबे मौकों पर तुम्हें अपने भीतर ही कारण मिल जाएगा। और जब सौ में निन्यानबे कारण तुम्हारे भीतर होंगे तो सौवां कारण अपने आप ही विदा हो जाएगा। तुम्हें जो कुछ होता है उसका कारण तुम स्वयं हो। तुम कारण हो; संसार तो बस दर्पण है।

लेकिन कहीं और कारण की खोज से सांत्वना मिलती है; तब तुम अपराध अनुभव नहीं करते, तब तुम आत्मनिंदा अनुभव नहीं करते। तुम सदा कह सकते हो कि यह रहा कारण, और जब तक कारण नहीं बदलता, मैं कैसे बदल सकता हूं! तुम कारण के पीछे अपने को छिपा लोगे। यह चालबाजी है। इसीलिए तुम्हारा मन कारण को और कहीं प्रक्षेपित करता रहता है। पत्नी पति के कारण परेशान है। मां बच्चों के कारण परेशान है। बच्चे पिता के कारण परेशान हैं। हर एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के कारण परेशान है। और हर एक व्यक्ति सदा यही सोचता है कि कारण बाहर है।

मुल्ला नसरुद्दीन एक सड़क से गुजर रहा था। शाम का समय था और अंधेरा उतर रहा था। अचानक उसे बोध हुआ कि सड़क बिलकुल सूनी है, कहीं कोई नहीं है। और वह भयभीत हो उठा। तभी उसे सामने से लोगों का एक झुंड आता दिखाई पड़ा। उसने चोरों, डाकुओं और हत्यारों के बारे में पढ़ रखा था। बस उसने भय पैदा कर लिया और भय से कांपने लगा। उसने सोच लिया कि ये डकैत और खूनी लोग आ रहे हैं, और वे उसे मार डालेंगे। तो इनसे कैसे जान बचाई जाए? उसने सब तरफ देखा।

पास में ही एक कब्रिस्तान था। मुल्ला उसकी दीवार लांघकर भीतर चला गया। वहा उसे एक ताजी खुदी कब मिल गई जो किसी के लिए उसी दिन खोदी गई थी। उसने सोचा कि इसी कब में मृत होकर पड़े रहना अच्छा है। उन्हें लगेगा कि कोई मुर्दा पड़ा है; मारने की जरूरत नहीं है। और मुल्ला कब में लेट गया।

वह भीड़ एक बरात थी, डाकुओं का गिरोह नहीं। बरात के लोगों ने भी मुल्ला को कापते और कूदते देख लिया था। वे भी डरे और सोचने लगे कि क्या बात है और यह आदमी कौन है?उन्हें लगा कि यह कोई उपद्रव कर सकता है, और इसी इरादे से यहां छिपा है। पूरी बरात वहा रुक गई और उसके लोग भी दीवार लांघकर भीतर गए।

मुल्ला तो बहुत डर गया। बरात के लोग उसके चारों तरफ इकट्ठे हो गए और उन्होंने पूछा:’तुम यहां क्या कर रहे हो? इस कब में क्यों पड़े हो?’ मुल्ला ने कहा: ‘तुम बहुत कठिन सवाल पूछ रहे हो। मैं तुम्हारे कारण यहां हूं और तुम मेरे कारण यहां हो।’

और यही सब जगह हो रहा है। तुम किसी दूसरे के कारण परेशान हो, दूसरा तुम्‍हारे कारण परेशान है। और तुम खुद अपने चारों ओर सब कुछ निर्मित करते हो, प्रक्षपित करते हो। और फिर खुद ही भयभीत होते हो, आतंकित होते हो, और अपनी सुरक्षा के उपाय करते हो। और तब दुख और निराशा होती है, द्वंद्व और विषाद पकड़ता है; कलह होती है। पूरी बात ही मूढ़तापूर्ण है;और यह सिलसिला तब तक जारी रहेगा जब तक तुम्हारी दृष्टि नहीं बदलती। सदा पहले अपने भीतर कारण की खोज करो। यातायात का शोरगुल तुम्हें कैसे परेशान कर सकता है? कैसे?अगर तुम उसके विरोध में हो तो ही वह तुम्हें परेशान करेगा। अगर तुम्हारी धारणा है कि उससे परेशानी होगी तो परेशानी होगी। लेकिन अगर तुम उसे स्वीकार कर लो, अगर तुम बिना कोई प्रतिक्रिया किए उसे होने दो, तो तुम उसका आनंद भी ले सकते हो। उसका अपना राग है, अपना संगीत है। तुमने उसे नहीं सुना है, इसका यह अर्थ नहीं है कि उसका अपना संगीत नहीं है।

किसी दिन अपने को भूल जाओ और यातायात के शोरगुल को सुनो। सिर्फ सुनो, अपनी धारणाओं को बीच में मत लाओ कि यह परेशान करता है, कि यह अच्छा नहीं है। अपनी पसंद—नापसंद को बीच में मत लाओ, बस सुनो। शुरू—शुरू में वह अराजक मालूम पड़ेगा—वह भी मन के कारण। अगर तुम पूरी तरह विश्रामपूर्ण हो सके तो देर—अबेर सब कुछ लयबद्ध हो जाएगा और सड़क का शोरगुल भी संगीत बन जाएगा। तब तुम उसका आनंद ले सकते हो, तुम उसकी धुन पर नाच भी सकते हो।

तो यह तुम पर निर्भर है। कुछ भी परेशान नहीं करता है; अगर तुम्हारा यह खयाल न हो कि वह परेशान करता है। उदाहरण के लिए मैं तुम्हें बताऊंगा कि कैसे केवल धारणाओं के चलते मनुष्यता अनेक चीजों से पीड़ित रही है। और जब धारणा बदल जाती है तो चीजें वही रहती हैं,लेकिन अब वे पीड़ित नहीं करतीं।

उदाहरण के लिए, हस्तमैथुन से सारी दुनिया पीड़ित थी। अभी आधी सदी पहले तक सारी दुनिया हस्तमैथुन के कारण परेशान थी। शिक्षक परेशान थे; मां—बाप परेशान थे; बच्चे परेशान थे। और अभी भी, पृथ्वी का जो बड़ा हिस्सा अशिक्षित है, वहा हस्तमैथुन परेशानी का कारण बना हुआ है। फिर शरीर—शास्त्रियों और मनसविदों ने खोज की कि हस्तमैथुन से परेशान होने का कोई कारण नहीं है। उन्होंने कहा कि हस्तमैथुन स्वाभाविक है और उसमें कुछ दोष नहीं है;यह बिलकुल निर्दोष और निरापद है।

लेकिन पुरानी शिक्षा कहती थी कि हस्तमैथुन के कारण आदमी पागल हो जाता है। वह हर एक चीज को हस्तमैथुन के साथ जोड देती थी। और करीब—करीब हर एक लड़का हस्तमैथुन करता था, और डरा—डरा रहता था। वह हस्तमैथुन करता था और डरा रहता था कि अब मैं पागल हो जाऊंगा; हीन, विक्षिप्त और बीमार हो जाऊंगा। वह सोचता था कि मेरा जीवन व्यर्थ हो गया। और वह अपने को रोक भी नहीं पाता था। और ये धारणाएं उसके सिर में घुसकर दुष्परिणाम लाती थीं। अनेक लोग पागल हो जाते थे; अनेक लोग हीन—भाव तथा मूढ़ता के शिकार हो जाते थे। और हस्तमैथुन से कुछ लेना—देना नही है।

आधुनिक शोध तो कहती है कि हस्तमैथुन स्वस्थ चीज है। चिकित्सा विज्ञान का मानना है कि यह अच्‍छी चीज है। क्‍योंकि तेरह—चौदह वर्ष का होने पर लड़का और बारह—तेरह वर्ष की होने पर लडकी कामवासना की दृष्टि से प्रौढ़ हो जाती है। अगर प्रकृति की सुनी जाए तो इसी उम्र में लड़के—लड़कियों का विवाह हो जाना चाहिए। वे संतान पैदा करने के योग्य हो गए हैं। लेकिन सभ्यता अपनी जरूरत के अनुसार उन्हें कोई बीस—पच्चीस की उम्र तक विवाह की इजाजत नहीं देती है। और चिकित्सा—शास्त्र कहता है कि चौदह से बीस वर्ष के बीच का समय—ये छह साल—कामवासना की दृष्टि से सर्वाधिक पुंसत्व— भरा, सर्वाधिक बलशाली समय है। एक लड़के में जितना पुंसत्व उस समय होता है उतना फिर कभी नहीं होता। उसकी ऊर्जा उफान पर होती है; उसका सारा शरीर कामुक विस्फोट बन जाना चाहता है।

लेकिन समाज उसकी इजाजत नहीं देता; वह उस पर अंकुश लगाता है। ऊर्जा प्रबल है,और बच्चा कुछ नहीं कर सकता। और वह जो कुछ करेगा, सामाजिक विश्वासों के कारण उसके दुष्परिणाम होंगे। वह समझेगा कि मुझसे भूल हो रही है, उसे अपराध— भाव सताएगा। और यह अपराध— भाव छाया की तरह उसका पीछा करेगा। उसे अनेक रोग भी हो सकते हैं—कृत्य के कारण नहीं, सिर्फ धारणा के कारण।

चिकित्सा—शास्त्र कहता है कि हस्तमैथुन स्वस्थ है, क्योंकि उससे लड़के को अनावश्यक ऊर्जा से राहत मिल जाती है; अन्यथा समस्याएं पैदा हो सकती हैं। अत: यह स्वस्थ चीज है। अब तो पश्चिम में, खास कर अमेरिका, इंगलैंड तथा दूसरे विकसित देशों में जो कि शरीर—विज्ञान में ज्यादा विकसित हैं, हस्तमैथुन का प्रचार किया जाता है। ऐसी फिल्में हैं जो बच्चों को सिखाती हैं कि हस्तमैथुन कैसे किया जाए। और देर—अबेर हर एक शिक्षक विद्यार्थियों को बताएगा कि सही ढंग से हस्तमैथुन कैसे किया जाता है। तो अब वे कहते हैं कि यह स्वस्थ है। और जो लोग ऐसा मानते हैं उन्हें यह स्वस्थ लगता भी है।

मेरी दृष्टि में यह न स्वस्थ है और न अस्वस्थ। धारणा असली चीज है। अगर इसे स्वस्थ माना जाए और इस धारणा को बल दिया जाए तो यह स्वस्थ हो जाएगा। अब पश्चिम में वे कहते हैं कि हस्तमैथुन से बुद्धि को कतई क्षति नहीं पहुंचती है। वे यहां तक कहते हैं कि जितनी ज्यादा बुद्धि उतना ज्यादा हस्तमैथुन। तो जो लड़का हस्तमैथुन करता है उसका बुद्धि—अंक उस लड़के से ज्यादा होगा जो हस्तमैथुन नहीं करता है।

और उनके ऐसा कहने का कारण है; क्योंकि लड़के के लिए हस्तमैथुन खोज निकालना उसकी बुद्धि की पहचान है; उसने एक रास्ता तो निकाला! समाज ने विवाह का दरवाजा बंद कर दिया है और प्रकृति है कि काम—ऊर्जा को धक्के मार रही है। बुद्धिमान लड़का रास्ता ढूंढ लेगा और मूढ़ अवरुद्ध रहेगा, कुंठा में फंसेगा। नया अध्ययन कहता है कि जो लड़के हस्तमैथुन करते हैं वे ज्यादा बुद्धिमान हैं। अगर यह धारणा फैली—और देर—अबेर यह धारणा सारे जगत में फैलेगी—तो हस्तमैथुन स्वास्थ्यप्रद हो जाएगा; और उससे लोग स्वस्थ अनुभव करेंगे।

अभी तो मां—बाप भयभीत हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि उन्होंने अपनी युवावस्था में क्या किया था। जब कोई लड़का किशोरावस्था में प्रवेश करने लगता है तो उसके मां—बाप चिंतित हो जाते हैं और ताक—झांक करने लगते हैं कि लड़का क्या करता है। उन्हें डर है कि वह


हस्तमैथुन तो नहीं करता है! और यदि लड़का ऐसा करता पाया जाता है तो वे उसे सजा देते हैं। लेकिन नया विज्ञान कहता है कि लड़के को सजा मत दो, बल्कि उसे हस्तमैथुन की शिक्षा दो। यदि वह हस्तमैथुन नहीं करता है तो उसे डाक्टर के पास ले जाओ और पता लगाओ कि क्या गडबडी है।

अगर यह नया ज्ञान फैलेगा तो यही होगा। लेकिन दोनों धारणाएं हैं, दोनों दृष्टियां हैं। और जब कोई लड़का हस्तमैथुन करता है तो उस क्षण में वह बहुत खुला हुआ और ग्रहणशील हो जाता है, उसका मन शात हो जाता है, क्योंकि इस क्षण में उसकी काम—ऊर्जा स्‍खलित हो रही है। इस समय जो भी सुझाव, जो भी विचार उसे दिया जाएगा, वह उस पर प्रभावी हो जाएगा। अगर तुम उसे कहोगे कि इसके कारण तुम बीमार हो जाओगे तो वह बीमार हो जाएगा। अगर तुम कहोगे कि इसके कारण तुम स्वस्थ होओगे तो वह स्वस्थ हो जाएगा। और अगर तुम उसे कहोगे कि हस्तमैथुन करने से तुम जिंदगी भर के लिए मूढ़ हो जाओगे तो वह सचमुच मूढ़ रह जाएगा। और यदि कोई उसे कहेगा कि हस्तमैथुन बुद्धि का लक्षण है तो उसका बुद्धि—अंक सचमुच बढ़ जाएगा। ऐसा होता है, क्योंकि बहुत ग्रहणशील क्षण में तुम उसे सुझाव दे रहे हो। तुम जो भी सोचते हो, वह घटित होने लगता है।

बुद्ध ने कहा है कि हर एक विचार यथार्थ हो जाता है, इसलिए सजग रहो।

अगर तुम सोचते हो कि सड़क का शोरगुल परेशान करता है तो वह तुम्हें जरूर परेशान करेगा, क्योंकि तुम परेशान होने को तैयार ही बैठे हो। अगर तुम सोचते हो कि पारिवारिक जीवन बंधन है तो वह तुम्हारे लिए बंधन हो जाएगा; तुम उसके लिए राजी ही हो। और अगर तुम सोचते हो कि गरीबी तुम्हें मुक्त होने में सहयोगी होगी तो वह सहयोगी होगी। अंततः तुम स्वयं ही अपने चारों ओर का संसार निर्मित करते हो; तुम जो भी सोचते हो वह तुम्हारा परिवेश बन जाता है और तुम उसमें ही जीते हो।

तंत्र कहता है, इस कारण को सदा स्मरण रखो, कारण सदा तुम्हारे भीतर है। और यदि तुम यह जान लो तो फिर तुम कारण नहीं बनोगे, फिर तुम अपने लिए कोई नया बंधन नहीं गढ़ोगे। और जो कारण गढ़ना बंद कर देता है वह मुक्त हो जाता है। तब न वह दुख में होता है और न आनंद में होता है। आनंद तुम्हारा सृजन है और दुख भी तुम्हारा सृजन है। तुम अपने दुख को आनंद में बदल सकते हो, क्योंकि वह तुम्हारा सृजन है। बुद्ध पुरुष न दुख में होते हैं और न आनंद में, क्योंकि वे कार्य—कारण से बाहर हो गए हैं। वे सिर्फ हैं।

इसीलिए बुद्ध कभी यह नहीं कहते कि आत्मोपलब्ध व्यक्ति आनंदित है। जब भी कोई उनसे पूछता कि बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति कैसा होता है? क्या वह परम आनंद में होता है? तो बुद्ध हंसते और कहते. ‘यह मत पूछो। मैं इतना ही कह सकता हूं कि वह दुख में नहीं होता। इससे ज्यादा मैं नहीं कह सकता, यही कह सकता हूं कि वह दुख में नहीं होता।’

बुद्ध का निषेध पर इतना जोर क्यों था? क्योंकि बुद्ध जानते हैं। जब तुम जान गए कि तुम ही अपने दुख का कारण हो तो तुम यह भी जान गए कि आनंद भी तुम्हारा ही कृत्य है। तब तुम कारण बनना छोड़ देते हो, कुछ भी करना छोड़ देते हो। इसे ही निर्वाण कहते हैं: अपने आस—पास समस्त कार्य—कारण का विसर्जन। तब तुम मात्र हो—न दुख, न आनंद। अगर तुम समझ सको तो यही आनंद है। न कोई दुख है, न आनंद; क्योंकि यदि आनंद है तो दुख भी रहेगा। तुम अभी भी कुछ पैदा कर रहे हो। और अगर तुम आनंद पैदा कर सकते हो तो दुःख भी पैदा कर सकते हो।

और तुम आनंद से भी ऊब जाओगे। कितनी देर सह सकोगे? कितनी देर? क्या तुमने कभी इस पर विचार किया है? यदि चौबीस घंटे आनंद के ही हों तो क्या तुम उसे झेल सकोगे? तुम बोर हो जाओगे, और ऐसे शिक्षक की तलाश में निकलोगे जो तुम्हें फिर से दुखी होना सिखाए।

मैं नहीं सोचता कि यदि सारा संसार आनंदित हो जाए तो फिर शिक्षक नहीं रहेंगे। शिक्षक रहेंगे, क्योंकि तब लोगों को दुख की जरूरत होगी। तब कोई यह बताने वाला जरूरी हो जाएगा कि कैसे फिर से दुखी हुआ जाए। सिर्फ थोड़ी बदलाहट के लिए दुख जरूरी हो जाएगा। उसके बाद तुम फिर आनंद में लौट सकते हो। और तब आनंद की अनुभूति बढ़ जाएगी, क्योंकि खोने के बाद ही तुम्हारी आनंद की अनुभूति प्रगाढ़ होती है। तो शिक्षक तो रहेंगे। अभी वे सुखी होना सिखाते हैं; तब वे दुखी होना सिखाएंगे; सिखाएंगे कि नरक का स्वाद कैसे लिया जाए। थोड़ी सी बदलाहट सहयोगी होगी, अच्छी होगी।

लेकिन तुम ही कारण हो। और तुम उसी क्षण बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाओगे जिस क्षण जान लोगे कि जिस संसार में तुम रहते हो वह तुम्हारा ही बनाया हुआ है। अब तुम उसे नहीं बनाओगे, और वह विलीन हो जाएगा। यातायात जारी रहेगा, शोरगुल जारी रहेगा, सब कुछ वैसा ही रहेगा जैसा है, लेकिन तुम नहीं रहोगे। क्योंकि कारण के साथ ही तुम भी विदा हो जाओगे।

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