कृतो दूरादेव स्मितमधुरमभ्युद्गमविधि:
शिरस्याज्ञा नयस्ता प्रतिवचनवत्यानतिमति।
न दृष्टे: शैथिल्यं मिलन इति चेतो दहति मे
निगूढान्त:कोषा कठिनहृदये!संवृतिकियम्।।१४।।
शठ नायक मानिनी नायिका से कहता है–
“हे कठिन हृदये,तुमनें दूर से हँसते हुये उठ कर मेरी स्वागत विधि का निर्वाह किया,उत्तर देनें में तुमनें अपनें झुके हुये मस्तक से मेरी आज्ञा शिरोधार्य की,नेत्रों के मिलानें में कोई आलस्य न प्रकट होनें दिया इस प्रकार(बाह्य शिष्टाचारों से भरी किन्तु प्रणयोत्साह से शून्य)अपने भीतर क्रोध का भाव छिपानें वाली तुम्हारी यह आकृति मेरे हृदय को अत्यन्त जला रही है।”