अमरूशतकम्-१३

कवि की उक्ति है-“आधी रात में जलबर्षा करते हुये बादल की गम्भीर ध्वनि सुनकर(राह के गाँव में डेरा डाले) बेचारे पथिक को दूरदेश में पड़ी हुयी विरहिणी बाला की याद आनें लगी और वह सारी रात मुक्तकंठ से फूट फूट कर इतना रोया कि तब से गाँव वालों नें फिर उस गाँव में पथिकों का ठहरना ही रोक दिया ।”

धीरं वारिधरस्य वारि किरत: श्रुत्वा निशीथे ध्वनिं

दीर्घोच्छ्वासमुदश्रुणा विरहिणीं बालां चिरं ध्यायता ।

अध्वन्येन विमुक्तकण्ठमखिलां रात्रि तथा क्रन्दितं

ग्रामीणै: पुनरध्वगस्य वसतिर्गामें निषिद्धा यथा ।।१३।।

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