अमरूशतकम्-१०

परदेश जानें का विचार छोड देने वाला नायक कारण पूँछनें पर अपनें मित्र से कह रहा है–

“जब मैनें अपनी प्रिया से रूँधे हुये गले से कहा कि ‘हे सुन्दरी, परदेश जानेवाले लौट कर फिर क्या अपने स्वजनों से मिलते नहीं हैं? इसलिये तुम मेरे लिये चिन्ता मत करो,तब उसनें गिरते हुये आँसुओं के पीकर लाज से जड़ सी बन गई आँखों से मेरी ओर देखा और उदासी भरी हँसी से अपनें भावी मरणोत्साह को व्यक्त कर दिया”

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