कुसुमस्तबकस्येव
द्वयीवृत्तिर्मनस्विनः।
मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य
विशीर्येत वनेऽथवा॥ |
फूलों की तरह मनस्वियों की दो ही गतियाँ होती हैं; वे या तो समस्त विश्व के सिर पर शोभित होते हैं या वन में अकेले मुरझा जाते हैं॥ |
Like a flower, great men have only two ways, either they shine on top of everyone or decay unnoticed in the forest. |
मन्दोऽप्यमन्दतामेति
संसर्गेण विपश्चितः।
पङ्कच्छिदः फलस्येव
निकषेणाविलं पयः॥ |
बुद्धिमानों के साथ से मंद व्यक्ति भी बुद्धि प्राप्त कर लेते हैं जैसे रीठे के फल से उपचारित गन्दा पानी भी स्वच्छ हो जाता है॥ |
Even a dull person becomes sharp by keeping company with the wise, as turbid water becomes clear when treated with the dust-removing fruit of ‘Reetha’.
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नरत्वं दुर्लभं लोके
विद्या तत्र सुदुर्लभा।
शीलं च दुर्लभं तत्र
विनयस्तत्र सुदुर्लभः॥ |
पृथ्वी पर मनुष्य जन्म मिलना दुर्लभ है, उनमें भी विद्या युक्त मनुष्य मिलना और दुर्लभ है, उनमें भी चरित्रवान मनुष्य मिलना दुर्लभ है और उनमें भी विनयी मनुष्य मिलना और दुर्लभ है॥ |
To born as human is rare in this world. To be knowledgeable also is even rarer. To have great character is even more rare . To be humble is the rarest of all.
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अकिञ्चनस्य दान्तस्य
शान्तस्य समचेतसः।
मया सन्तुष्तमानसः
सर्वाः सुखमया दिशाः॥ |
कुछ न रखने वाले, नियंत्रित, शांत, समान चित्त वाले, मन से संतुष्ट मनुष्य के लिए सभी दिशाएं सुखमय हैं॥ |
For a man having nothing, controlled, peaceful, even-tempered and self-content all the directions are pleasant. |
आचारः परमो धर्म
आचारः परमं तपः।
आचारः परमं ज्ञानम्
आचरात् किं न साध्यते॥ |
सदाचरण सबसे बड़ा धर्म है, सदाचरण सबसे बड़ा तप है, सदाचरण सबसे बड़ा ज्ञान है, सदाचरण से क्या प्राप्त नहीं किया जा सकता है? |
Right conduct is the highest religion. Right conduct is the greatest penance. Right conduct is the greatest knowledge. What can’t be achieved through right conduct? |
सुखं हि दुःखान्यनुभूय शोभते
यथान्धकारादिव दीपदर्शनम्।
सुखात्तु यो याति दशां दरिद्रतां
धृतः शरीरेण मृतः स जीवति॥ |
दुःख का अनुभव करने के बाद ही सुख का अनुभव शोभा देता है जैसे कि घने अँधेरे से निकलने के बाद दीपक का दर्शन अच्छा लगता है।॥ सुख से रहने के बाद जो मनुष्य दरिद्र हो जाता है, वह शरीर रख कर भी मृतक जैसे ही जीवित रहता है॥ |
Only after experiencing miseries, one can appreciate happiness, just as the sight of a lamp after experiencing thick darkness gives joy. One who experiences penury after luxury, lives as a dead man. |
क्रोधो मूलमनर्थानां
क्रोधः संसारबन्धनम्।
धर्मक्षयकरः क्रोधः
तस्मात् क्रोधं विवर्जयेत्॥ |
क्रोध समस्त विपत्तियों का मूल कारण है,क्रोध संसार बंधन का कारण है, क्रोध धर्म का नाश करने वाला है, इसलिए क्रोध को त्याग दें |
Anger is the root cause of all misfortunes. Anger is the reason for bondage with this world. Anger reduces righteousness, hence give up anger. |
आकाशात्पतितं तोयं
यथा गच्छति सागरम्।
सर्वदेवनमस्कारः
केशवं प्रतिगच्छति॥ |
आकाश से गिरा हुआ पानी जैसे समुद्र में जाता है, उसी प्रकार किसी भी देवता को किया गया नमस्कार श्रीहरि (श्रीकृष्ण) को जाता है॥ |
Just as all the water falling from the sky goes into sea, similarly salutations offered to all Gods go to Sri Hari (Sri Krishna).
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मनसा चिन्तितंकार्यं
वचसा न प्रकाशयेत्।
अन्यलक्षितकार्यस्य
यत: सिद्धिर्न जायते॥ |
मन से सोचे हुए कार्य को वाणी से न बताए क्योंकि जिस कार्य पर किसी और की दृष्टि लग जाती है, वह फिर पूरा नहीं होता॥ |
While thinking of doing some work, don’t disclose it to others. If others also target it, it might not succeed.
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सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥ |
सभी सुखी हों, सभी रोगरहित हों, सभी कल्याण को देखें और कोई भी दुःख का भागी न हो॥ |
Let all be happy, let all be free of diseases, let all see prosperity and none should get sad.
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अष्टादशपुराणेषु
व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय
पापाय परपीडनम्॥ |
अट्ठारह पुराणों में श्रीव्यास के दो वचन (प्रमुख) हैं – परोपकार से पुण्य होता है और पर-पीड़ा से पाप॥ |
There are two main sayings of Sri Vyasa in eighteen ‘Puranas’ – Helping others is a virtue and hurting others is sin. |
अन्नदानं परं दानं
विद्यादानमतः परम्।
अन्नेन क्षणिका तृप्ति–
र्यावज्जीवं च विद्यया॥ |
अन्न दान परम दान है, अतः विद्या दान उससे भी बड़ा है क्योंकि अन्न से क्षण भर की तृप्ति होती है और विद्या से आजीवन॥ |
Giving food is the greatest charity so giving knowledge is even greater than that because food provides the contentment for a minute and knowledge for whole life.
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केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं
हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः
न स्नानं न विलोपनं
न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं
या संस्कृता र्धायते
क्षीयन्ते खलु भूषणानि
सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥ |
बाजुबंद पुरुष को शोभित नहीं करते और न ही चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार, न स्नान, न चन्दन, न फूल और न सजे हुए केश ही शोभा बढ़ाते हैं। केवल सुसंस्कृत प्रकार से धारण की हुई एक वाणी ही उसकी सुन्दर प्रकार से शोभा बढ़ाती है। साधारण आभूषण नष्ट हो जाते हैं, वाणी ही सनातन आभूषण है॥ |
Bracelets do not adorn a man, nor do necklaces which shine like the moon. Neither a bath, nor an ointment, nor flowers and nor decorated hair adorn him. It is cultured speech alone which properly embellishes a man. All other ornaments lose their glitter, only the jewel of speech ever remains. |
काव्यशास्त्रविनोदेन
कालो गच्छति धीमताम्।
व्यसनेन तु मूर्खाणां
निद्रया कलहेन वा॥ |
बुद्धिमानों का समय काव्य और शास्त्र से आनंद प्राप्त करने में व्यतीत होता है, जबकि मूर्खों का समय व्यसन, नींद औरकलह में व्यतीत होता है॥ |
The wise utilize their time enjoying poetry and scriptures whereas fools waste it in bad habits, sleep and quarrel. |
दानेन तुल्यं सुहृदास्ति नान्यो
लोभाच्च नान्योऽस्ति रिपुः पृथिव्याम्।
विभूषणं शीलसमं न चान्यत्
सन्तोषतुल्यं धनमस्ति नान्यत्॥ |
दान के समान अन्य कोई सुहृद नहीं है और पृथ्वी पर लोभ के समान कोई शत्रु नहीं है। शील के समान कोई आभूषण नहीं है और संतोष के समान कोई धन नहीं है॥ |
There is no well-wisher like charity and there is no bigger enemy than greediness in this world. There is no other ornament like character and there is no other money like satisfaction. |
न धैर्येण विना लक्ष्मी-
र्न शौर्येण विना जयः।
न ज्ञानेन विना मोक्षो
न दानेन विना यशः॥ |
धैर्य के बिना धन, वीरता के बिना विजय, ज्ञान के बिना मोक्ष और दान के बिना यश प्राप्त नहीं होता है॥ |
Money without patience, victory without courage, liberation without knowledge and fame without charity cannot be achieved.
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नरस्याभरणं रूपं
रूपस्याभरणं गुणः।
गुणस्याभरणं ज्ञानं
ज्ञानस्याभरणं क्षमा॥ |
मनुष्य का आभूषण रूप, रूप का आभूषण गुण, गुणों का आभूषण ज्ञान और ज्ञान का आभूषण क्षमा है॥ |
Ornament of a man is beauty, ornament of beauty is virtue, ornament of virtues is knowledge and the ornament of knowledge is forgiveness. |
न हि ज्ञानसमं लोके
पवित्रं चान्यसाधनं।
विज्ञानं सर्वलोकानामु-
त्कर्षाय स्मृतं खलु॥ |
इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र दूसरा कोई साधन नहीं है, शास्त्रों में विज्ञान को समस्त लोकों की प्रगति के लिए निश्चित किया गया है॥ |
There is nothing more sacred than knowledge in this world. In scriptures, science is considered fundamental to progress of this world. |
नमन्ति फलिता वृक्षा
नमन्ति च बुधा जनाः।
शुष्ककाष्ठानि मूर्खाश्च
भिद्यन्ते न नमन्ति च॥ |
फले हुए वृक्ष झुक जाते हैं और बुद्धिमान लोग विनम्र हो जाते हैं पर सूखी लकड़ी और मूर्ख काटने पर भी नहीं झुकते॥ |
Trees with fruits bend, wise people become humble but dry wood and fool do not bend even when they are cut. |
निन्दन्तु नीतिनिपुणा
यदि वा स्तुवन्तु
लक्ष्मीः स्थिरा भवतु
गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु
युगान्तरे वा
न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति
पदं न धीराः॥ |
नीति में निपुण मनुष्य चाहे निंदा करें या प्रशंसा, लक्ष्मी आयें या इच्छानुसार चली जायें, आज ही मृत्यु हो जाए या युगों के बाद हो परन्तु धैर्यवान मनुष्य कभी भी न्याय के मार्ग से अपने कदम नहीं हटाते हैं॥ |
Worldly-wise may insult or praise, wealth may come or go by itself, they may die today or may live for hundred years but men of patience never divert from the path of justice. |
पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः
स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः
परोपकाराय सतां विभूतयः॥ |
नदियाँ अपना पानी स्वयं नहीं पीती, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, बादल अपने बरसाए पानी द्वारा उगाया हुआ अनाज स्वयं नहीं खाते। सत्पुरुषों का जीवन परोपकार के लिए ही होता है। |
The rivers don’t drink their own water. The trees don’t eat their own fruits. The clouds don’t eat the crops grown from their water. Lives of the nobles are only for helping others. |
प्रारभ्यते न खलु
विघ्नभयेन नीचैः
प्रारभ्य विघ्नविहता
विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि
प्रतिहन्यमानाः
प्रारभ्य चोत्तमजना
न परित्यजन्ति॥ |
निम्न श्रेणी के पुरुष विघ्नों के भय से किसी नये कार्य का आरंभ ही नहीं करते। मध्यम श्रेणी के पुरुष कार्य तो आरंभ कर देते हैं पर विघ्नों से विचलित होकर उसे बीच में ही छोड़ देते हैं, परन्तु उत्तम श्रेणी के पुरुष बार-बार विघ्न आने पर भी प्रारंभ किये गये कार्य को पूर्ण किये बिना नहीं छोड़ते हैं॥ |
Low level men do not start any work due to fear of obstacles. Mediocres start a work but leave it in between due to disturbances. Bur, the men of excellence never leave a job unfinished after starting it whatever may be the problems. |
प्रियवाक्यप्रदानेन
सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।
तस्मात् तदेव वक्तव्यं
वचने किं दरिद्रता॥ |
प्रिय वाक्य बोलने से सभी प्रसन्न होते हैंइसलिए प्रिय ही बोलना चाहिए, बोलने में क्या दरिद्रता? |
Speaking pleasant words makes everybody content. So, why be poor in speaking sweet words? |
मात्रा समं नास्ति शरीरपोषणं
चिन्तासमं नास्ति शरीरशोषणं।
मित्रं विना नास्ति शरीर तोषणं
विद्यां विना नास्ति शरीरभूषणं॥ |
संतुलित जीवन के समान शरीर का पोषण करने वाला दूसरा नहीं है, चिंता के समान शरीर को सुखाने वाला दूसरा नहीं है, मित्र के समान शरीर को आनंद देने वाला दूसरा नहीं है और विद्या के समान शरीर का दूसरा कोई आभूषण नहीं है॥ |
Nothing nourishes body like balanced life. Nothing sucks body like anxiety. Nothing pleases body like friend. There is no ornament for body like knowledge. |
मूकं करोति वाचालं
पंगुं लंघयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे
परमानन्दमाधवम् ॥ |
जिनकी कृपा से गूंगे बोलने लगते हैं, लंगड़े पहाड़ों को पार कर लेते हैं, उन परम आनंद स्वरुप श्रीमाधव की मैं वंदना करता हूँ॥ |
By whose grace dumbs start talking, lame men climb mountains, I worship that Sri Krishna, the supreme bliss. |
मृगा मृगैः संगमुपव्रजन्ति
गावश्च गोभिस्तुरगास्तुरंगैः।
मूर्खाश्च मूर्खैः सुधयः सुधीभिः
समानशीलव्यसनेषु सख्यं॥ |
मृग मृगों के साथ, गाय गायों के साथ, घोड़े घोड़ों के साथ, मूर्ख मूर्खों के साथ और बुद्धिमान बुद्धिमानों के साथ रहते हैं; समान आचरण और आदतों वालों में ही मित्रता होती है॥ |
Deers stay with deers, cows stay with cows, horses stay with horses, fools stay with fools and wise men stay with wise. Friendship in people with similar character and habits is natural.
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सन्तोषामृततृप्तानां
यत्सुखं शान्तचेतसाम्।
कुतस्तद्धनलुब्धानां
एतश्चेतश्च धावताम्॥ |
संतोष रूपी अमृत से तृप्त शांत मन वालों का सुख उन लोभियों को कैसे मिल सकता है जो धन के पीछे अचेत होकर भागते फिरते हैं॥ |
How can greedy men sense the pleasure of men who are fulfilled with nectar of contentment? They only run after money without thinking. |
विद्या विवादाय धनं मदाय
खलस्य शक्तिः परपीडनाय।
साधोस्तु सर्वं विपरीतमेतद्
ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥ |
दुष्ट की विद्या विवाद के लिए, धन अहंकार के लिए और शक्ति दूसरों को कष्ट देने के लिए होती है इसके विपरीत सज्जनों की विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए और शक्ति दूसरों की रक्षा के लिए होती है॥ |
A rogue utilizes his education for debate(quarrel), money for pride and power for oppressing others whereas a noble utilizes his education for knowledge, money for charity and power for securing others. |
सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः
कीर्तिस्त्यागानुसारिणी।
अभ्याससारिणी विद्या
बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥ |
लक्ष्मी सत्य का अनुसरण करती हैं, कीर्ति त्याग का अनुसरण करती है, विद्या अभ्यास का अनुसरण करती है और बुद्धि कर्म का अनुसरण करती है॥ |
Money follows truth, fame follows renunciation, knowledge follows practice and mind follows actions. |
सज्जनस्य हृदयं नवनीतं
यद्वदन्ति कवयस्तदलीकं।
अन्यदेहविलसत्परितापात्
सज्जनो द्रवति नो नवनीतम्॥ |
कविगण सज्जनों के हृदय को जो नवनीत (मक्खन) के समान बताते हैं, वह भी असत्य ही है। दूसरे के शरीर में उत्पन्न ताप (दुःख) से सज्जन तो पिघल जाते हैं पर मक्खन नहीं पिघलता॥ |
The poets say that the heart of noble men is as soft as butter but this seems to be incorrect. As nobles softens by the pain in others but not butter. |
सप्तैतानि न पूर्यन्ते पूर्यमाणान्यनेकशः।
स्वामी पयोधिरुदरं
कृपणोऽग्निर्यमो गृहम्॥ |
ये सात कभी पूरे नहीं होते और पूरे करने पर बढकर अनेक हो जाते हैं – मालिक, समुद्र, पेट, कंजूस, अग्नि, मृत्यु और घर॥ |
These seven are never complete and while trying to complete they grow multiple times – Employer, Sea, Stomach, Miser, Fire, Death and Construction of House. |
विवेक: सह संपत्या
विनयो विद्यया सह।
प्रभुत्वं प्रश्रयोपेतं चिन्हमेतन्महात्मनाम्॥ |
संपत्ति के साथ विवेक, विद्या के साथ विनय और शक्ति के साथ दूसरों की सुरक्षा, ये महापुरुषों के लक्षण हैं॥ |
Right discrimination with money, humility with knowledge and protection with power are said to be the characteristics of great men. |
एकवर्णं यथा दुग्धं
भिन्नवर्णासु धेनुषु।
तथैव धर्मवैचित्र्यं
तत्त्वमेकं परं स्मॄतम्॥ |
जिस प्रकार अनेक रंगों की गायें एक रंग का ही (श्वेत) दूध देती हैं, उसी प्रकार विभिन्न धर्मों में एकही परम तत्त्व का उपदेश दिया गया है॥ |
As cows of different colours produce one colour milk, similarly, different religions instruct about the one ultimate reality. |
षड् दोषा: पुरूषेणेह
हातव्या भूतिमिच्छता।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध:
आलस्यं दीर्घसूत्रता॥ |
सम्पन्न होने की इच्छा वाले मनुष्य को इन छः बुरी आदतों को त्याग देना चाहिए – (अधिक) नींद, जड़ता, भय, क्रोध, आलस्य और कार्यों को टालने की प्रवृत्ति॥ |
A man wishing to prosper in this world, should leave 6 bad qualities – extra sleep, lethargy, fear, anger, laziness and procrastination. |
ये केचिद् दु:खिता लोके
सर्वे ते स्वसुखेच्छया।
ये केचित् सुखिता लोके
सर्वे तेऽन्यसुखेच्छया॥ |
इस संसार में जो कोई भी दुखी हैं वे अपने सुख की इच्छा से ही दुखी हैं और इस संसार में जो कोई भी सुखी हैं वे दूसरों के सुख की इच्छा से ही सुखी हैं॥ |
Whosoever in unhappy in this world is due to their desire for their own happiness. Whosoever in happy in this world is due to their desire for the happiness of others. |
षड् गुणा: पुरुषेणेह
त्यक्तव्या न कदाचन।
सत्यं दानम् अनालस्यम्
अनसूया क्षमा धॄति:॥ |
इस छःगुणों को व्यक्ति को कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए – सत्य, दान, तत्परता, दूसरों में दोष न देखने की प्रवृत्ति, क्षमा और धैर्य॥ |
A man should never give up these six qualities – Truth, Charity, Promptness, not finding faults in others, Forgiveness and Patience. |
न तु अहं कामये राज्यं
न स्वर्गं न अपुनर्भवम्।
कामये दु:खतप्तानां
प्राणिनाम् आर्तिनाशनम्॥ |
न मैं राज्य की इच्छा रखता हूँ, न स्वर्ग या मोक्ष की ही, मेरी तो यही अभिलाषा है कि दुःख से पीड़ित सभी प्राणियों के दुःख का नाश हो जाये॥ |
I do not desire kingdom, or the heaven or liberation. I wish that all the suffering living beings be relieved from their pain. |
अस्थिरं जीवितं लोके
अस्थिरे धनयौवने।
अस्थिरा: पुत्रदाराश्र्च
धर्मकीर्तिद्वयं स्थिरम्॥ |
इस जगत में जीवन सदा न रहने वाला है, धन और यौवन भी सदा न रहने वाले हैं, पुत्र और स्त्री भी सदा न रहने वाले हैं। केवल धर्म और कीर्ति ही सदा रहने वाले हैं॥ |
Life in this world is ephemeral, wealth and youthfulness are also ephemeral, association with son and wife is also ephemeral. Only Righteousness and Fame always remain. |
शैले शैले न माणिक्यं
मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र
चन्दनं न वने वने॥ |
सभी पर्वतों में मणियाँ नहीं होतीं, सभी हाथियों के मस्तक मेंमोती नहीं होते, साधु पुरुष सभी स्थानों में नहीं मिलते औरचन्दन सभी वनों में नहीं पाया जाता है॥ |
Not every mountain has gems in them, and not every elephant has pearl on its forehead. Saints are not found everywhere and not every forest has sandal trees. |
विरला जानन्ति गुणान्
विरला: कुर्वन्ति निर्धने स्नेहम्।
विरला: परकार्यरता:
परदु:खेनापि दु:खिता विरला:॥ |
कोई कोई ही दूसरों के गुणों को जानते हैं, कोई कोई ही गरीबों से स्नेह रखते हैं, कोई कोई दूसरों की सहायता करते हैं और कोई कोई ही दूसरों के दुःख से दुखी होते हैं॥ |
Rare are those who appreciate the qualities of others, rare are those who are compassionate towards poor, rare are those who help others and rare are those who feel sad on the miseries of others. |
यदा न कुरूते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम्।
समदॄष्टेस्तदा पुंस:
सर्वा: सुखमया दिश:॥ |
जब मनुष्य किसी भी जीव के प्रति अकल्याणकारी भावना नहीं रखता है तब उस समदृष्टि पुरुष के लिए सभी दिशाएं सुख देने वाली हो जाती हैं॥ |
When a man does not wish inauspicious things for anyone, for that man of neutral perception, all directions are pleasant. |
अमॄतं चैव मॄत्युश्च द्वयं
देहप्रतिष्ठितम्।
मोहादापद्यते मॄत्यु:
सत्येनापद्यतेऽमॄतम्॥ |
अमरता और मॄत्यु दोनों एक ही शरीर में निवास करती हैं, मोह से मॄत्यु प्राप्त होती है और सत्य से अमरत्व॥ |
Immortality and Death both reside in the body only. Death is attained due to delusion and Immortality by truth. |
अक्षरद्वयम् अभ्यस्तं नास्ति
नास्ति इति यत् पुरा।
तद् इदं देहि देहि इति
विपरीतम् उपस्थितम्॥ |
पूर्व में गरीबों के प्रति किये गए ‘नहीं है’ नहीं है’ से मनुष्य भविष्य में मांगने की स्थिति की प्राप्त होता है॥ |
Habit of saying ‘No’ No’ to the poor in the past, gives rise to the pathetic condition of asking others in future. |
मनस्येकं वचस्येकं
कर्मण्येकं महात्मनाम्।
मनस्यन्यत् वचस्यन्यत्
कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्॥ |
महापुरुषों के मन, वचन और कर्म में समानता पाई जाती है पर दुष्ट व्यक्ति सोचते कुछ और हैं, बोलते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं॥ |
Great men act alike by mind, speech and conduct. But the wicked men think something else, speak something else and do something else. |
क्रोध: सुदुर्जय: शत्रु:
लोभो व्याधिरनन्तक:।
सर्वभूतहित: साधु:
असाधुर्निदय: स्मॄत:॥ |
क्रोध को मनुष्य का जीतने में कठिन शत्रु कहा गया है, लोभ कभी न ख़त्म होने वाला रोग कहा गया है। साधु पुरुष वह है जो दूसरों के कल्याण में लगा हुआ है और असाधु वह है जो दया से रहित है |
Anger is said to be the difficult enemy to conquer and greed is said to be the endless disease. A saint is one who seeks welfare of all others and a wicked is one who has no compassion for others. |