| स हि भवति दरिद्रो यस्य तॄष्णा विशाला। मनसि च परितुष्टे कोर्थवान् को दरिद्रा:॥ |
जिसकी कामनाएँ विशाल हैं, वह ही दरिद्र है। मन से संतुष्ट रहने वाले के लिए कौन धनी है और कौन निर्धन॥ | The person with vast desires is definitely poor. For the one with satisfied mind, there is no distinction between rich and poor. |
| यथा धेनुसहस्त्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्। तथा पूर्वकॄतं कर्म कर्तारमनुगच्छत्॥ |
जिस प्रकार एक बछड़ा हजार गायों के बीच में अपनी माँ को पहचान लेता है, उसी प्रकार पूर्व में किये गए कर्म कर्ता का अनुसरण करते हैं॥ | A calf recognizes its mother among thousands of cows; similarly, previous deeds go with the doer. |
| दूरस्थोऽपि न दूरस्थो, यो यस्य मनसि स्थित:। यो यस्य हॄदये नास्ति, समीपस्थोऽपि दूरत:॥ |
जो जिसके मन में बसता है वह उससे दूर होकर भी दूर नहीं होता और जिससे मन से सम्बन्ध नहीं होता वह पास होकर भी दूर ही होता है॥ | If someone resides in your heart, he / she is not far even if physically far. If you don’t like someone he / she is distant even if spatially close. |
| कश्चित् कस्यचिन्मित्रं, न कश्चित् कस्यचित् रिपु:। अर्थतस्तु निबध्यन्ते, मित्राणि रिपवस्तथा॥ |
न कोई किसी का मित्र है और न शत्रु, कार्यवश ही लोग मित्र और शत्रु बनते हैं॥ | Neither anybody is a friend of others nor enemy. Need (or situation) only makes them friend or enemy. |
| अर्थानाम् अर्जने दु:खम् अर्जितानां च रक्षणे। आये दु:खं व्यये दु:खं धिग् अर्था: कष्टसंश्रया:॥ |
धन के कमाने में दुःख है, कमाने के बाद धन के संरक्षण में दुःख है, आय में दुःख है, व्यय में दुःख है, कष्ट के आश्रय धन को धिक्कार है॥ | Earning money is painful, after earning its protection is painful. Its income is painful, its expenditure is painful. So money is to be condemned which is root cause of problems. |
| कस्यैकान्तं सुखम् उपनतं, दु:खम् एकान्ततो वा। नीचैर् गच्छति उपरि च, दशा चक्रनेमिक्रमेण॥ |
किसने केवल सुख ही देखा है और किसने केवल दुःख ही देखा है, जीवन की दशा एक चलते पहिये के घेरे की तरह है जो क्रम से ऊपर और नीचे जाता रहता है॥ | Who has only experienced constant happiness or constant sorrows? Situations in life are similar to a point on the moving wheel which goes up and down regularly. |
| अल्पानामपि वस्तूनाम्, संहतिः कार्यसाधिका। तॄणैर्गुणत्वमापन्नैः, बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥ |
छोटी वस्तुओं का मेल भी कार्य पूरा करने वाला होता है, तृण के गुण से शक्तिशाली हाथी भी बंधन को प्राप्त होता है॥ |
Union of even small quantities of things can be instrumental in a great work. Virtue of hay sticks forces a powerful elephant to bondage. |
| सर्वं परवशं दु:खं सर्वम् आत्मवशं सुखम्। एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदु:खयो:॥ |
पराधीन के लिए सर्वत्र दुःख है और स्वाधीन के लिए सर्वत्र सुख। यह संक्षेप में सुख और दुःख के लक्षण हैं॥ | There is pain everywhere for dependent and there is pleasure everywhere for independent. In short, these are the characteristics of pleasure and pain. |
| अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम्। अधनस्य कुतो मित्रम् अमित्रस्य कुतो सुखम्॥ |
आलसी के लिए विद्या कहाँ, विद्याहीन के लिए धन कहाँ, निर्धन के मित्र कहाँ और बिना मित्रों के सुख कहाँ॥ | A lazy cannot acquire knowledge. Without knowledge wealth cannot be had. Without wealth, you cannot get friends and without friends there is no happiness. |
| अनेकशास्त्रं बहुवेदितव्यम्, अल्पश्च कालो बहवश्च विघ्ना:। यत् सारभूतं तदुपासितव्यं, हंसो यथा क्षीरमिवाम्भुमध्यात्॥ |
अनेक शास्त्र हैं, बहुत जानने को है और समय कम है और बहुत विघ्न हैं। अतः जो सारभूत है उसका ही सेवन करना चाहिए जैसे हंस जल और दूध में से दूध को ग्रहण कर लेता है॥ | There are many scriptures, lot to know but time is limited and there are many obstacles. So we should practice the essence as a swan extracts only milk from the combination of milk and water. |
| दुर्लभं त्रयमेवैतत् देवानुग्रहहेतुकम्। मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरूषसंश्रय:॥ |
यह तीन दुर्लभ हैं और देवताओं की कृपा से ही मिलते हैं – मनुष्य जन्म, मोक्ष की इच्छा और महापुरुषों का साथ॥ | These three are very difficult to get and can be got only by the grace of the gods – human birth, desire for salvation and the company of the nobles. |
| सुखार्थी त्यजते विद्यां विद्यार्थी त्यजते सुखम्। सुखार्थिन: कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिन: सुखम्॥ |
सुख चाहने वाले को विद्या और विद्या चाहने वाले को सुख त्याग देना चाहिए। सुख चाहने वाले के लिए विद्या कहाँ और विद्यार्थी के लिए सुख कहाँ॥ | If you aspire for comforts, leave the knowledge. If you aspire for knowledge, leave the comforts. Aspirant for comforts cannot get knowledge and aspirant for knowledge cannot get comforts. |
| दिवसेनैव तत् कुर्याद् येन रात्रौ सुखं वसेत्। यावज्जीवं च तत्कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत्॥ |
दिन में वह करना चाहिए जिससे रात में सुख से रहा जा सके। जब तक जीवित हैं तब तक वह करना चाहिए जिससे मरने के बाद सुख से रहा जा सके॥ | Do that in the day which makes you happy at night. Do that throughout the life which could make you happy after death. |
| जरा रूपं हरति, धैर्यमाशा, मॄत्यु: प्राणान्, धर्मचर्यामसूया। क्रोध: श्रियं, शीलमनार्यसेवा, ह्रियं काम:, सर्वमेवाभिमान:॥ |
वृद्धावस्था सुन्दरता का, धैर्य इच्छाओं का, मृत्यु प्राणों का, धर्मं का आचरण अपवित्रता का, क्रोध प्रतिष्ठा का, चरित्र बुरी संगति का, लज्जा काम का और अभिमान सबका नाश कर देता है॥ | Old age destroys beauty, patience destroys desires, death destroys life, righteous conduct destroys impurity, anger destroys reputation, character destroys the company of bad people, shyness destroys sexual desires and pride destroys everything. |
| वॄत्तं यत्नेन संरक्ष्येद् वित्तमेति च याति च। अक्षीणो वित्तत: क्षीणो वॄत्ततस्तु हतो हत:॥ |
चरित्र की प्रयत्न पूर्वक रक्षा करनी चाहिए, धन तो आता-जाता रहता है। धन के नष्ट हो जाने से व्यक्ति नष्ट नहीं होता पर चरित्र के नष्ट हो जाने से वह मरे हुए के समान है॥ | We should guard our character attentively; money can come and go. If money is lost, nothing is lost but if character is lost, everything is lost. |
| न प्रहॄष्यति सन्माने नापमाने च कुप्यति। न क्रुद्ध: परूषं ब्रूयात् स वै साधूत्तम: स्मॄत:॥ |
जो सम्मान करने पर हर्षित न हों और अपमान करने पर क्रोध न करें, क्रोधित होने पर कठोर वचन न बोलें, उनको ही सज्जनों में श्रेष्ठ कहा गया है॥ | Those, who do not become happy by honor and do not get angry by dishonor, do not use harsh words, even in anger, are said to be greatest among saints. |
| अकॄत्यं नैव कर्तव्य प्राणत्यागेऽपि संस्थिते। न च कॄत्यं परित्याज्यम् एष धर्म: सनातन:॥ |
न करने योग्य कार्य को प्राण जाने की परिस्थिति में भी नहीं करना चाहिए और कर्त्तव्य का कभी त्याग नहीं करना चाहिए, यह सनातन धर्म है॥ | One must not be act improperly even at the cost of life. And the duty must be performed. This is eternal religion. |
| मातॄवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत्। आत्मवत्सर्वभूतेषु य: पश्यति स पश्यति॥ |
दूसरों की स्त्रियों को माता के समान, दूसरों के धन को मिट्टी के समान, समस्त प्राणियों को अपने समान जो देखता है, वह (वास्तविक रूप में ) देखता है॥ | One who sees wives of others as mothers, sees money of others as dust, sees other living beings like himself, actually sees correctly. |
| नात्युच्चशिखरो मेरुर्- नातिनीचं रसातलम्। व्यवसायद्वितीयानां नात्यपारो महोदधि:॥ |
परिश्रमी व्यक्ति के लिए मेरु पर्वत अधिक ऊँचा नहीं है, पाताल बहुत नीचा नहीं है और महासागर बहुत विशाल नहीं है॥ | For a diligent person, even the mountain ‘Meru’ is not very high, bottom of the earth is not too deep and the ocean is not difficult to cross. |
| अर्थनाशं मनस्तापम्, गृहे दुश्चरितानि च। वञ्चनं चापमानं च, मतिमान्न प्रकाशयेत्॥ |
बुद्धिमान धन के नाश, मन के दुःख और घर की कलह, धोखे और अपमान को गुप्त रक्खे, किसी को न बताए॥ |
A wise man should not divulge the loss of money, distress of mind, quarrels at home and that he has been cheated or insulted. |
| आचाराल्लभते ह्यायु: आचारादीप्सिता: प्रजा:। आचाराद्धनमक्षयम् आचारो हन्त्यलक्षणम्॥ |
सदाचार से आयु की प्राप्ति होती है, सदाचार से अभिलषित संतान की प्राप्ति होती है, सदाचार से कभी न नष्ट होने वाले धन की प्राप्ति होती है, सदाचार से बुरी आदतों का नाश होता है॥ | Righteousness gives long life, righteousness gives desired progeny, righteousness gives ever-lasting wealth, righteousness destroys other defects. |
| श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसा:। वाग्यता: शुचयश्चैव श्रोतार: पुण्यशालिन:॥ |
श्रद्धा और भक्ति से समान रूप से युक्त, अन्य कार्यों की इच्छा न रखने वाले, कम और सुन्दर बोलने वाले, श्रोता ही पुण्यवान हैं॥ | Those who possess reverence and devotion equally, have no desire for other things, speak less and pure are virtuous listeners. |
| परवाच्येषु निपुण: सर्वो भवति सर्वदा। आत्मवाच्यं न जानीते जानन्नपि च मुह्मति॥ |
दूसरों के बारे में बोलने में सभी हमेशा ही कुशल होते हैं पर अपने बारे में नहीं जानते हैं, यदि जानते भी हैं तो गलत ही॥ | Anybody is an expert to comment about others, anytime. But nobody knows about himself; even if, he knows, he knows incorrectly. |
| गौरवं प्राप्यते दानात्, न तु वित्तस्य संचयात्। स्थिति: उच्चै: पयोदानां, पयोधीनां अध: स्थिति:॥ |
धन के दान से ही प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, धन के संचय से नहीं। बादलों का स्थान ऊपर है और समुद्र का नीचे॥ | Reputation is achieved by distributing money and not by collecting it. Clouds command a high position whereas the sea lies low. |
| जलबिन्दुनिपातेन, क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां, धर्मस्य च धनस्य च॥ |
पानी की बूंदों के गिरने से घड़ा धीरे-धीरे भर जाता है। ऐसा ही सभी विद्याओं, धर्म और धन के साथ है॥ | The pot gets filled sequentially, by drops of water. Same is true for all types of knowledge, righteousness and wealth. |
| सतां हि दर्शनं पुण्यं तीर्थभूताश्च सज्जनाः। कालेन फलते तीर्थम् सद्यः सज्जनसङ्गतिः॥ |
सज्जनों के दर्शन से पुण्य होता है, सज्जन जीवित तीर्थ हैं, तीर्थ तो समय आने पर ही फल देते हैं, सज्जनों का साथ तो तुरंत फलदायी होता है॥ | Seeing the saints makes us holy, saints are living temples. Sacred places benefit only at appropriate time but saints benefit immediately. |
| यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते, सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥ |
जहाँ पर स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। जहाँ पर ऐसा नहीं होता है वहां पर सभी कार्य निष्फल होते हैं॥ | Where women are worshiped, there lives the Gods. Wherever they are not worshiped, all actions result in failure. |
| न अन्नोदकसमं दानं न तिथि द्वादशीसमा। न गायत्र्याः परो मन्त्रो न मातु: परदैवतम्॥ |
अन्न और जल के समान दान नहीं है, द्वादशी से समान तिथि नहीं है, गायत्री से बड़ा मंत्र नहीं है और माता से बड़ा देवता नहीं है॥ | Giving food and water is the highest charity, twelfth moon day is the most auspicious date, ‘Gayatri Mantra’ is the best among the ‘Mantras’ and mother is the highest God. |
| शरदि न वर्षति गर्जति, वर्षति वर्षासु नि:स्वनो मेघ:। नीचो वदति न कुरुते, न वदति सुजन: करोत्येव॥ |
पतझड़ के बादल केवल गरजते हैं, बरसते नहीं; वर्षा ऋतु के मेघ चुपचाप (बिना गरजे) वर्षा करते हैं। दुष्ट लोग कहते हैं पर करते नहीं, सज्जन कार्य करते हैं पर कहते नहीं॥ | Clouds in autumn make lot of noise but do not rain. Monsoon clouds rain, without making noise. An inferior person just talks, does not act but a good person acts without talking. |
| परिवर्तिनि संसारे मॄत: को वा न जायते। स जातो येन जातेन याति वंश: समुन्न्तिम्॥ |
इस बदलते संसार में कौन ऐसा है जो जन्म लेकर मृत्यु को प्राप्त नहीं हुआ है। जन्म लेना उसका ही सफल है जिससे उसका वंश उन्नति को प्राप्त हो॥ | Who has not died after taking birth in this ever changing world? He alone is considered as born who makes his dynasty prosperous. |
| सर्वनाशे समुत्पन्ने ह्मर्धं त्यजति पण्डित:। अर्धेन कुरुते कार्यं सर्वनाशो हि दु:सह:॥ |
सर्वनाश की स्थिति उत्पन्न होने पर बुद्धिमान आधे का त्याग कर देते हैं और आधे से ही कार्य करते हैं। सर्वनाश असहनीय है॥ | In the condition of total devastation, wise give up half and save the other half for their work. Loss of everything is unbearable. |
| विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥ |
विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन की प्राप्ति होती है, धन से धर्म और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है॥ | Knowledge gives humility, humility leads to capability, from capability one acquires wealth, wealth leads to righteousness and then happiness follows. |
| तत् कर्म यत् न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये। आयासाय अपरं कर्म विद्या अन्याशिल्पनैपुणम्॥ |
वह कर्म है जो बंधन में न डाले, वह विद्या है जो मुक्त कर दे। अन्य कर्म श्रम मात्र हैं और अन्य विद्याएँ यांत्रिक निपुणता मात्र हैं॥ | That is action which does not bind. That is knowledge which liberates. Other actions are hardship only and other knowledge are just mechanical skills |
| क्रोधमूलो मनस्तापः क्रोधः संसारबन्धनम्। धर्मक्षयकरः क्रोधः तस्मात्क्रोधं परित्यज॥ |
क्रोध मन के दुःख का प्राथमिक कारण है, क्रोध संसार बंधन का कारण है, क्रोध धर्म का नाश करने वाला है, इसलिए क्रोध को त्याग दें॥ | Anger is the root cause of mental distress. Anger is the reason for bondage with this world. Anger reduces righteousness, hence give up anger. |
| जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यम् मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति। चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिम् सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम् ॥ |
मन की जड़ता का नाश करती है, वाणी को सत्य से सींचती है, सम्मान और उन्नति की दिशा दिखाती है, पापों को दूर करती है, चित्त को प्रसन्न करती है, यश का दिशाओं में विस्तार करती है, कहो सज्जनों की संगति मनुष्य का क्या भला नहीं करती॥ | It removes the inertia of the mind, fosters truth in speech, directs to respect and progress, removes sins, pleases the mind, expands the fame in all directions. Is there anything that the company of virtuous people doesn’t provide? |
| दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये सञ्चयो न कर्तव्यः। पश्येह मधुकरीणां सञ्चितार्थं हरन्त्यन्ये॥ |
धन के सम्बन्ध में दान देना और भोग करना ही उचित है, धन का संचय नहीं करना चाहिए। देखिये, मधु- मक्खियों का संचित किया हुआ शहद कोई और ही ले जाता है॥ | Money should either be given as charity or enjoyed but should not be stocked. Look, the collected savings of the bees (honey) is taken by others. |
| पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जलमन्नं सुभाषितम्। मूढैः पाषाणखण्डेषु, रत्नसंज्ञा विधीयते॥ |
पृथ्वी पर तीन रत्न हैं – जल, अन्न और सुन्दर वचन। मूर्खों ने ही पत्थर के टुकड़ों (हीरे आदि)को रत्न का नाम दिया हुआ है॥ | There are three gems on earth: water, food and wise sayings. Only the ignorant consider pieces of stone (diamond etc.) as gems. |
| सहसा विदधीत न क्रियाम् अविवेकः परमापदां पदम्। वृणुते हि विमृश्यकारिणम् गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥ |
किसी भी कार्य को एकाएक शुरू नहीं करना चाहिए , बिना सोचे विचारे कार्य करना बड़ी परेशानी का कारण होता है।संपत्ति भली भांति विचार करके कार्य करने वाले के गुणों से प्रसन्न होकर स्वयं उसका वरण करती है॥ | One should not act in haste. Action without thinking leads to big problems. Wealth chooses that person by itself who acts after thinking properly. |
| प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो देवोऽपि तं लङ्घयितुं न शक्तः। तस्मान्न शोचामि न विस्मयो मे यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम् ॥ |
मनुष्य को जो प्राप्त होना होता है, उसका उल्लंघन करने में देवता भी समर्थ नहीं हैं इसलिए मुझे न आश्चर्य है और न शोक क्योंकि जो मेरा है वह किसी दूसरे का नहीं है॥ | Whatever belongs to you will come to you , even Gods cannot change that. That is why I do not get either disappointed or surprised. No one else can take whatever is mine. |
| दानं भोगो नाशस्तिस्रो, गतयो भवन्ति वित्तस्य। यो न ददाति न भुङ्क्ते, तस्य तृतीयागतिर्भवति॥ |
दान, भोग और नाश धन की यह तीन गतियाँ ही होती हैं। जो न दान देता है और न भोग करता है, उसके धन की तीसरी गति ही होती है॥ | Money can have only three states: charity, enjoyment or loss.One who neither donates nor enjoys with his money, his money ends up in the third state. |
| शोकस्थानसहस्राणि, भयस्थानशतानि च। दिवसे दिवसे मूढम्, आविशन्ति न पण्डितम्॥ |
दुःख के हजारों कारण हैं, भय के भी सौ कारण हैं, ये दिन-प्रतिदिन मूर्खों को ही चिंतित करते हैं, बुद्धिमानों को नहीं॥ | There are thousands of reasons to be sad and hundreds of reasons to be afraid. These perturb the deluded day after day and not the wise. |
| अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च। वश्यश्च पुत्रोऽर्थकारी च विद्या षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन्॥ |
हे महाराज. धन की आय, नित्य आरोग्य, प्रिय और मधुर बोलने वाली पत्नी, आज्ञाकारी पुत्र और धन देने वाली विद्या, यह इस पृथ्वी के छः सुख कहे गए हैं॥ | O King, arrival of money, regular good health, loving and sweetly speaking wife, obedient son and money earning knowledge are said to be the six pleasures on this earth. |
| यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते। ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवाणि नष्टमेव हि॥ |
जो निश्चित को छोड़कर अनिश्चित का आश्रय लेते हैं, उनका निश्चित भी नष्ट हो जाता है और अनिश्चित तो लगभग नष्ट के समान है ही॥ | Those who leave the permanent things and go after the impermanent, their permanent things get destroyed and the impermanent are anyways mostly unsure! |
| सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा। शान्ति: पत्नी क्षमा पुत्र: षडेते मम बान्धवा:॥ |
सत्य मेरी माता, ज्ञान मेरा पिता, धर्म मेरा भाई, दया मेरी मित्र, शांति मेरी पत्नी, क्षमा मेरा पुत्र है। यह छः मेरे सम्बन्धी हैं॥ | Truth is my mother, Knowledge is my father, Righteousness is my brother, Mercy is my friend, Peace is my wife and Forgiveness my son. These six are my kith and kins. |
| शोको नाशयते धैर्य, शोको नाशयते श्रॄतम्। शोको नाशयते सर्वं, नास्ति शोकसमो रिपु॥ |
शोक धैर्य का नाश करता है, शोक स्मृति का नाश करता है, शोक सबका नाश करता है, शोक के समान दूसरा शत्रु नहीं है॥ | Disappointment destroys patience, disappointment destroys memory, disappointment destroys everything. There is no other enemy like disappointment.
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