| अब्धेः क्षारं जलं पीत्वा वर्षन्ति मधुरं भुविम्। परोपकारे निरताः कथं मेघा न सज्जनाः॥ |
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| सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमय: पिता। मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्॥ |
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| सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥ |
The Upanishads are the cows milked by Gopāla, the son of Nanda, and Arjuna is the calf. Wise and pure men drink the milk, the supreme, immortal nectar of the Gita | |
| नाहं वसामि वैकुंठे योगिनांहृदये न च। मद्भक्ता यत्र गायंति यत्र तिष्ठामि नारद॥ |
हे नारद! मैं न तो बैकुंठ में ही रहता हूँ और न योगियों के हृदय में ही रहता हूँ। मैं तो वहीं रहता हूँ, जहाँ प्रेमाकुल होकर मेरे भक्त मेरे नाम का कीर्तन किया करते हैं। | |
| रज्जुसर्पवदात्मानम् जीवो ज्ञात्वा भयंवहेत्। नाहं जीवः र्रात्मेतत ज्ञातश्चेन्ननभपयो भवेत्॥ |
“Having mistaken oneself as a (vulnerable mortal) individual, one gets overwhelmed with fear. It is like mistaking a rope for a snake; however, when one realizes one’s true … | |
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शब्दादिभिः पंचभिरेवपंच
पंचत्वमापुः स्वगुणेन बद्धाः। कुरंग मातंग पतंग मीन
भृंगा नरः पंचभिरंचितः किम्॥ |
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| सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम्। सामुद्रो हि तरंगः क्वचन समुद्रो न तारंगः॥ |
हे नाथ ! आपका और मेरा भेदभाव चला गया है, फिर भी मैं आपका हूँ, (पर) आप मेरे नहीं है ! जिस प्रकार तरंगें समंदर की है, और ना कि समंदर तरंगों का । | |
| सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा यदि वाप्रियम् । प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः ॥ |
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| एकोऽपि गुणवान्पुत्रो निर्गुणैश्च शतैर्वरः। एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः सहस्रशः॥४.६॥ वरमेको गुणी पुत्रो न तु मूर्खशतान्यपि। एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न तु तारागणोऽपि च॥ |
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| ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। (यजुर्वेद – ३६.३) |
उस प्राण स्वरुप, दुःख नाशक, सुख स्वरुप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पाप नाशक , देव स्वरुप परमात्मा को हम अंतरात्मा में धारण करें | वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें | | |
| राम नाम रटते रहो, जब लगि घट में प्रान। कबहूं तो दीनदयाल के, भनक परेगी कान॥ |
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| तेरे भाएँ जो करो , भलो बुरो संसार। नारायण तू बैठि कै अपनी भवन बुहार॥ |
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| राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। अंत काल पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट॥ |
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| देह दृष्ट्या तु दासोऽहं, जीव दृष्ट्या त्वदंशकः। वस्तुतस्तु त्वमेवाहं इति मे निश्चिता मतिः॥ |
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