सभी काव्य परमात्मा का है..ओशो

जय ओशो..🌞🌞

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सभी काव्य परमात्मा का है..

तीन तरह के कवि होते हैं। एक, जिसको परमात्मा की झलक स्वप्न में मिलती है। जिनको हम साधारणतः कवि कहते हैं–कि सुमित्रानंदन पंत कि मिल्टन कि एजरा पाउंड–इनको स्वप्न में झलक मिलती है। इन्होंने जाग कर परमात्मा नहीं देखा है; नींद-नींद में, सोए-सोए कोई भनक पड़ गई है कान में। उसी भनक को ये गीत में बांधते हैं। फिर भी इनके गीत में माधुर्य है। इनके जीवन में परमात्मा नहीं है। फिर भी इनके गीत में माधुर्य है। इनके जीवन में परमात्मा नहीं है। कभी किसी गुलाब के फूल में थोड़ी सी झलक मिली है, आहट मिली है; कभी चांद में, तारों में आहट मिली है; कभी किसी नदी की, झरने कलकल में आहट मिली है; कभी सागर की उत्तुंग तरंगों में उसका रूप झलका है, लेकिन सीधा-सीधा दर्शन नहीं हुआ है। यह सब सोए-सोए हुआ है। ये नींद-नींद में हैं। ये मूर्च्छित हैं। मगर फिर भी इनके काव्य में अपूर्व रस है।

काव्य तो परमात्मा का ही है–सभी काव्य परमात्मा का है, क्योंकि सभी सौंदर्य उसका है। काव्य का अर्थ हुआ, सौंदर्य की स्तुति। काव्य का अर्थ हुआ, सौंदर्य की प्रशंसा, सौंदर्य का यशोगान, सौंदर्य की महिमा का वर्णन। काव्य यानी सौंदर्यशास्त्र। और सारा सौंदर्य उसका है! इनको कहीं-कहीं उसकी झलक मिली है; कहीं-कहीं उसके पदचिह्न पता चले हैं। जाग कर नहीं, क्योंकि जागने के लिए तो इन्होंने कुछ भी नहीं किया। जागने के लिए तो ये रोए नहीं, जागने के लिए तो ये तड़पे नहीं। जागता तो केवल भक्त है।

तो दूसरे तरह का कवि है, यह है भक्त, संत। उसने सौंदर्य को नहीं देखा है, उसने सुंदरतम को देखा है। उसने सिर्फ भनक नहीं देखी है, उसने मूल को देखा है। ऐसा समझो कि कोई गीत गाता है किसी पहाड़ पर और घाटियों में उसकी आवाज गूंजती है। कवियों ने उसकी गूंज सुनी है, संतों ने सीधे संगीतज्ञ को देखा है। कवियों ने दूर से संगीत की उठती गूंज घाटियों में है, अनुगूंज, प्रतिध्वनि, उसको पकड़ा है; संतों ने सीधा-सीधा उसके दरबार में बैठ कर पकड़ा है। स्वभावतः उनकी वाणी का बल अपूर्व है। कवि कलात्मक रूप से ज्यादा कुशल होता है, क्योंकि काव्य उसका रुझान है। संत कलात्मक रूप से उतना कुशल नहीं होता, क्योंकि कविता की कला उसने कभी नहीं सीखी है। तो काव्य की दृष्टि से शायद संतों के वचन बहुत कविता न हों, लेकिन सत्य की दृष्टि से परम काव्य हैं।

फिर एक तीसरा कवि होता है जो न तो संत है और न कवि है; जिसको केवल काव्य-शास्त्र का पता है; अलंकार, मात्रा, इस सबका पता है। वह उस हिसाब से तुकबंदी कर देता है। न उसने सत्य को देखा है, न सत्य की छाया देखी, लेकिन भाषाशास्त्र को जानता है, व्याकरण को जानता है; तुकबंद है, वह तुकबंदी बांध देता है।

दुनिया में सौ कवियों में नब्बे तुकबंद होते हैं। कभी-कभी अच्छी तुकबंदी बांधते हैं। मन मोह ले, ऐसी तुकबंदी बांधते हैं। लेकिन तुकबंदी ही है, प्राण नहीं होते भीतर। कुछ अनुभव नहीं होता भीतर। ऊपर-ऊपर जमा दिए शब्द, मात्राएं बिठा दीं, संगीत और शास्त्र के नियम पालन कर लिए। सौ में नब्बे तुकबंद होते हैं। बाकी जो दस बचे उनमें नौ कवि होते हैं, एक संत होता है।

  • ओशो

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