मैंनें काव्यरचना नहीं की मगर,काव्यसिक्त हो गया हूँ।

मैंनें जीवन में छंदबद्ध श्लोकों की रचना नहीं की है मगर,

नियमित दिनचर्या के पालन से जीवन को छंदबद्ध कर लिया है,

मैंनें रसयुक्त श्लोकों की रचना नहीं की है मगर,

हमेशा वर्तमान में रहकर दैनिन्दिन जीवन को रसयुक्त कर लिया है।

मैंनें अलंकारों से युक्त श्लोकों की रचना नहीं की है मगर,

पुरूषार्थ और अपरिग्रह को अपनाकर जीवन अलंकारों से युक्त कर लिया है।

मैंनें रूपकों में विभिन्न नायकों की कल्पना नहीं की है मगर,

स्वयं के जीवन को अभिनय समझकर जीनें से मैं स्वयं नायक हो गया हूँ।

मैंनें गुणयुक्त श्लोक की रचना नहीं की है मगर,

जीवन को माधुर्य,ओज,प्रसाद आदि गुणों से युक्त कर लिया है।

मैंनें रीतियुक्त श्लोकों की रचना नहीं की है मगर,

मेरे जीवन जीनें के ढंग में एक रीतियुक्त ढंग है।

स्वामी आशुतोष

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