बुद्ध कथा

1- मन सभी प्रवत्तियों का पुरोगामी है,मन उनका प्रधान है,वे मनोमय हैं,यदि कोई दोषयुक्त मन से बोलता है या कर्म करता है तो दुख उसका अनुसरण वैसे ही करता है जैसे गाड़ी का चक्का ,खींचनें वाले बैलों के पैर का ।उसनें मुझे डांटा,मुझे मारा,मुझे जीत लिया,मेरा लूट लिया-जो ऐसी गांठे मन में बनाये रखते हैं,उनका बैर शांत नहीं होता ।उसनें मुझे डांटा,मुझे मारा,मुझे जीत लिया,मेरा लूट लिया-जो ऐसी गांठे मन में नहीं बनाये रखते हैं,उनका बैर शांत हो जाता है ।इस संसार में बैर से बैर कभी शांत नहीं होता । अबैर से ही वैर शांत होता है, यही सनातन धर्म है। यही नियम है। हम इस संसार में नहीं रहेंगे,सामान्यजन यह नहीं जानते और जो इसे जानते हैं,उनके सारे कलह शांत हो जाते हैं ।

2- विषय रस में शुभ देखते हुये विहार करनें वाले,इन्द्रियों में असंयत,भोजन में मात्रा न जानने वाले ,आलसी और अनुद्यमी पुरुष को मार(काम) वैसे ही गिरा देता है जैसे आंधी दुर्बल बृक्ष को । विषय रस में अशुभ देखते हुये विहार करनें वाले,इन्द्रियों में संयत,भोजन में मात्रा जाननें वाले,श्रृद्धावान, और उद्यमी पुरुष को मार-काम वैसे ही नहीं डिगाता जैसे आंधी शैल पर्वत को । जो असार को सार समझते हैं और सार को असार, वे मिथ्या संकल्प के भाजन लोग सार को प्राप्त नहीं होते ।जो सार को सार जानते हैं और असार को असार वे सम्यक संकल्प के भाजन लोग सार को प्राप्त होते हैं। जिस तरह ठीक प्रकार से न छाये हुये घर में बर्षा का पानी घुस जाता है ,उसी प्रकार ध्यान भावना से रहित चित्त में राग घुस जाता है। जिस प्रकार ठीक से छाये हुये घर में बर्षा का पानी नहीं घुस पाता ,उसी प्रकार ध्यान भावना से युक्त चित्त में राग नहीं घुस पाता है ।

3- इस लोक में शोक करता है और परलोक में भी ,पापी दोनों जगह शोक करता है। वह अपने मैले कर्मों को देखकर शोक करता है,वह अपनें मैले कर्मों को देखकर पीड़ित होता है। इस लोक में भी मुदित होता है और परलोक में भी,पुण्यात्मा दोनों लोक में मुदित होता है। वह अपनें कर्मों की विशुद्धि को देखकर मुदित होता है,प्रमुदित होता है। इस लोक में संतप्त होता है और परलोक में भी,पापी दोनों लोक में संतप्त होता है । मैंनें पाप किया कह कहकर संतप्त होता है। दुर्गति को प्राप्त कर वह फिर संतप्त होता है। भले ही कोई बहुत सी संहिता कंठस्थ कर ले ,लेकिन प्रमादवश उसका आचरण न करे तो वह दूसरो की गौयें गिनने वाले ग्वाले के समान है और वह श्रामण्य का अधिकारी नहीं होता। राग द्वेष और मोह को छोड़कर तथा इस लोक और परलोक में किसी भी चीज के प्रति निरभिलाष हो यही सनातन धर्म है ।

4- अप्रमाद अमृत का पथ है और प्रमाद मृत्यु का । अप्रमादी नहीं मरते , लेकिन प्रमादी तो मृतवत ही हैं। पंडितजन अप्रमाद के विषय में यह अच्छी तरह जानकर आर्यों के ,बुद्ध के उचित आचरण में निरत रहकर अप्रमाद में प्रमुदित होते हैं। वे ध्यान का सतत अभ्यास करनें वाले और सदा दृढ पराक्रम करनें वाले धीर पुरुष अनुत्तर योगक्षेम रुप निर्वाण को प्राप्त होते हैं। जो उत्थानशील,स्मृतिवान,शुचि कर्म वाला तथा विचार कर काम करने वाला है,उस संयत,धर्मानुसार जीविका वाला एवं अप्रमादी पुरुष का यश बढ़ता है । मेधावी पुरुष को उत्थान,अप्रमाद,संयम और दम के द्वारा ऐसा द्वीप बना लेना चाहिये जिसे बाढ़ न डुबा सके । दुर्बुद्धि लोग प्रमाद में लगते हैं और बुद्धिमान पुरुष श्रेष्ठ धन की तरह अप्रमाद की रक्षा करते हैं। एस धम्मो सनंतनो ।

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