पतंजलि का चित्तवृत्ति निरोध

सम्राट पुष्पमित्र ने अश्वमेध—यज्ञ किया।
यज्ञ की पूर्णाहुति हो चुकी थी, रात को अतिथियों के सत्कार में नृत्योत्सव था।
जब यज्ञ के ब्रह्मा महर्षि पतंजलि उसमें उपस्थित हुए, तो उनके शिष्य चैत्र के मन में गुरु के व्यवहार के औचित्य के विषय में शंका—शूल चुभ गया।

पतंजलि, योग—सूत्रों के निर्माता।
जिन्होंने योग की परिभाषा ही की है. चित्तवृत्ति—निरोध।
कि चित्त की वृत्तियों का निरोध हो जाए तो आदमी योग को उपलब्ध होता है।
स्वभावत: उनका एक शिष्य चैत्र बड़ी शंका में पड़ गया कि गुरुदेव कहां जा रहे हैं?
सम्राट ने उत्सव किया है रात, उसमें वेश्याएं नाचने वाली हैं। योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः!
और यह पतंजलि अब तक समझाते रहे कि चित्तवृति का निरोध ही योग है,
यह भी वहा जा रहे हैं। तो उसे बहुत शंका—शूल चुभ गया।
उस दिन से उसका मन महाभाष्य और योगसूत्रों के अध्ययन में न लगता था।
जब शंका हो जाए तो फिर कैसे लगे?
श्रद्धा में ही मन लगता है, शंका में तो दूरी हो गयी।
उस दिन से गुरु से नाता टूट गया।
रहा, अब भी रहा गुरु के पास, अब भी उठता था,
चरण भी छूता था, आदर भी देता था, मगर भीतर अड़चन हो गयी।
अंत में एक दिन जब महर्षि चित्तवृत्ति—निरोध के साधनों पर बोल रहे थे, तो चैत्र ने यह प्रासंगिक प्रश्न किया—भगवन, क्या नृत्य—गीत और रस—रंग भी चित्तवृत्ति—निरोध में सहायक हैं?

पारदर्शी पतंजलि मुस्कुराए और बोले—चैत्र, वास्तव में तुम्हारा प्रश्न तो यह है कि क्या उस रात मेरा सम्राट के नृत्य—उत्सव में सम्मिलित होना संयम—व्रत के विरुद्ध नहीं था?
वर्ष बीत गए थे उस बात को हुए तो, लेकिन दिखता रहा होगा पतंजलि को कि इसके मन में बात चुभ गयी है, चुभ गयी है, चुभ गयी है,
राह देखता, प्रतीक्षा करता, किसी अवसर पर प्रश्न को खड़ा करेगा।
अप्रासंगिक भी नहीं होना चाहिए, नहीं तो गुरु सोचेंगे कि यह मैंने संदेह किया।

शायद वर्ष के बीतने के बाद जब फिर कभी पतंजलि बोलते होंगे चित्तवृत्ति— निरोध पर, तो उसने कहा कि महाराज, क्या नृत्य इत्यादि में सम्मिलित होना भी चित्तवृत्ति के निरोध में सहायक होता है?
सोचता होगा, वर्ष बीत गए, अब तो महर्षि भूल भी गए होंगे उस बात को।
और उनको तो याद भी कैसे होगा, मैंने तो कभी कहा भी नहीं कि शंका—शूल मेरी छाती में चुभा है और मेरी श्रद्धा तुम पर डगमगा गयी है।
मैंने तुम्हें वहा देखा है, वेश्याएं नृत्य करती थीं और शराब के प्याले चलते थे—राजदरबार था—वहा आप क्या कर रहे थे!
आधी रात तक वहा आपको बैठने की जरूरत क्या थी?
ये सब बातें थीं, कहना तो ऐसे ही चाहता था,
लेकिन इतनी हिम्मत कभी जुटा न पाया।
लेकिन पारदर्शी पतंजलि मुस्कुराए और बोले. चैत्र,
वास्तव में तुम्हारा असली प्रश्न तो यह है कि क्या उस रात मेरा सम्राट के नृत्य—उत्सव में सम्मिलित होना संयम—व्रत के विरुद्ध नहीं था?
संयम के सच्चे अर्थ को तुम समझे नहीं। सुनो, सौम्य!
आत्मा का स्वरूप है रस—रसो वै सः —उस रस को परिशुद्ध और अविकृत रखना ही संयम है।
विकृति की आशंका से रस—विमुख होना ऐसा ही है जैसे कोई गृहिणी भिखारियों के भय से घर में भोजन पकाना ही बंद कर दे। बड़ी अनूठी बात कही।
भिखारी आते हैं, इस भय से घर में भोजन ही न बनाओ—न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। मगर यह तो भिखारियों के पीछे खुद भी मरे।
भोजन न पका तो खुद भी मरे।
तो पतंजलि ने कहा, रस तो जीवन का स्वभाव है, रसो वै सः, यह तो परमात्मा का स्वभाव है रस, उत्सव तो परमात्मा का होने का ढंग है, यह तो आत्मा की आंतरिक दशा है—रस।
इस रस से विमुख होकर, इस रस को दबाकर, इस रस को विकृत करके कोई व्यक्ति मुक्त नहीं होता।
और फिर इस डर से कि कहीं रस पैदा न हो जाए तुम उन—उन स्थानों से भागते रहो जहां—जहां रस पैदा हो सकता है, तो इससे भी कुछ मुक्ति नहीं होती।
संयम का ठीक—ठीक अर्थ तो होता है—इस रस को परिशुद्ध करना;
इस रस को अविकृत रखना।
रस को विकृत करने की परिस्थितियों में ही तो सिद्ध होगा कि रस विकृत होता है, नहीं होता? अविकृत रहता है, नहीं रहता?
जहां विकार खड़ा हो, वहा तुम्हारा रस परिशुद्ध भीतर नाचता रहे, विकार और रस में मिश्रण न हो, वहीं तो कसौटी है।
विकृति की आशंका से रस—विमुख होना ऐसा ही होगा जैसे कोई गृहिणी भिखारियों के भय से घर में भोजन पकाना बंद कर दे।
अथवा कोई कृषक भेड़—बकरियों के भय से खेती करना ही छोड़ बैठे। यह संयम नहीं, पलायन है।
यह आत्मघात का दूसरा रूप है।
आत्मा को रस—वर्जित बनाने का प्रयत्न ऐसा ही भ्रमपूर्ण है जैसे जल को तरलता से अथवा अग्नि को ऊष्मा से मुक्त करने की चेष्टा।
इस भ्रम में मत फंसो।
यह बड़ी अपूर्व घटना है। और पतंजलि के मुंह से तो और भी अपूर्व है।
कृष्ण ने कही होती तो ठीक था, समझ में आ जाती बात, लेकिन पतंजलि यह कहते हैं!
जिन्होंने पतंजलि का योगसूत्र ही पढ़ा है, वे तो चौकेंगे।
क्योंकि पतंजलि के योगसूत्र से तो ऐसी भ्रांति पैदा होती लगती है कि पतंजलि दमन के ही पक्ष में हैं।
कोई ज्ञानी दमन के पक्ष में कभी नहीं रहा।
अगर तुम्हें लगता हो, रहा, तो तुम्हारी समझ में कहीं भूल हो गयी है।
शानी मुक्ति के पक्ष में है, दमन के पक्ष में नहीं।
फिर कृष्ण हों कि पतंजलि, मुक्त होना है, दमित नहीं।
जो दमित हो गया, वह तो बड़े कारागृह में पड़ गया।
तुम दबा लो अपनी वासना को, बैठी रहेगी भीतर, सुलगती रहेगी, उमगती रहेगी, धीरे— धीरे भीतर उपद्रव खड़ा करती रहेगी, एक न एक दिन विस्फोट होगा। जब विस्फोट होगा तो तुम विक्षिप्त हो जाओगे।
विमुक्त होना तो दूर, विक्षिप्तता हाथ लगेगी।
ज्ञानियों ने यही कहा है—भागो मत, जो भीतर है,
उसके प्रति जागो, उसके प्रति ध्यान को उठाओ,
साक्षी बनो, देखो कि मेरे भीतर काम है, कि क्रोध है, कि लोभ है।
और इस देखने में संसार बड़ा सहयोगी है।

ओशो

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