कुछ अटक गए भाषाओं में,
कुछ देश धर्म मुल्लाओं में,
कुछ भटके तीर्थ हजारों में,
काशी काबा गिरनारों में,
अब कौन राह बतलायेगा
मूढों को कौन जगाएगा
जो गीता पाठ दोहराएंगे
वह बंसी नहीं सुन पाएंगे
जो बाहर दर्शन को जाएंगे
उर में नहीं ज्योति को पाएंगे
सामाजिक उत्थान हुआ पर
अटका अब धर्म विचारों में
अब कौन राह बतलायेगा
मूढों को कौन जगाएगा
वे कहते हैं कि पा ही लिया है
पाने को जो भी था पाना
पुस्तक पढ़ कर स्वयं को जाना
छंद शास्त्र से काव्य बखाना
अब तोते रसिक कहायेंगे
रसौ वै स: ये पढायेंगे
अब कौन राह बतलायेगा
मूढों को कौन जगाएगा
SWAMI ASHUTOSH