ओंम स्वप्रकाश आनंद—स्वरूप भगवान शिव को नमन
(अब) शिवसूत्र (प्रारंभ)
चैतन्य आत्मा है।
ज्ञान बंध है।
यौनिवर्ग और कला शरीर है।
उद्यम ही भैरव है।
शक्तिचक्र के संधान से विश्वक्त संहार खो जाता है।
जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति— इन तीनों अवस्थाओं को पृथक रूप से जानने से तुर्यावस्था का भी ज्ञान हो जाता है ज्ञान का बना रहना ही जाग्रत अवस्था है।
विकल्प ही स्वप्न हैं।’’
अविवेक अर्थात स्व—बोध का अभाव मायामय सुषुप्ति है।
तीनों का भोक्ता वीरेश कहलाता है।
विस्मय योग की भूमिका है।
स्वयं में स्थिति ही शक्ति है।
वितर्क अर्थात विवेक आत्मज्ञान का साधन है।
अस्तित्व का आनंद भोगना समाधि है।
चित्त ही मंत्र है।
प्रयत्न ही साधक है।
गुरु उपाय है।
शरीर हवि है।
ज्ञान ही अन्न है।
विद्या के संहार से स्वप्न पैदा होते है।
आत्मा चित्त है।
कला आदि तत्वो का अविवेक ही माया है।
मोह आवरण से युक्त को सिद्धियां तो फलित हो जाती है। लेकिन आत्मज्ञान नहीं होता है।
स्थाई रूप से मोह जय होने पर सहज विद्या फलित होती है।
ऐसे जाग्रत योगी को, सारा जगत मेरी ही किरणों का प्रस्फुरण है—ऐसा बोध होता है।
आत्मा नर्तक है।
अंतरात्मा रंगमंच है।
बुद्धि के वश में होने से सत्व की सिद्धि होती है। और सिद्ध होने से स्वातंत्र्य फलित होता है।
स्वतंत्र स्वभाव के कारण वह अपने से बाहर भी जा सकता है और वह बाहर स्थित रहते हुए अपने अंदर भी रह सकता है।
ध्यान बीज है।
आसनस्थ अर्थात स्व—स्थित व्यक्ति सहज ही चिदात्म सरोवर में निमज्जित हो जाता है और आत्म—निर्माण अर्थात द्विजत्व को प्राप्त करता है।
विद्या का अविनाश जन्य का विनाश है।
तीनों अवस्थाओं में चौथी अवस्था का तेल की तरह सिंचन करना चाहिए ऐसा मग्न हुआ स्व—चित्त में प्रवेश करे।
प्राणसमाचार (अर्थात सर्वत्र परमात्म—ऊर्जा का प्रस्फुरण है—ऐसा अनुभव कर) से समदर्शन को उपलब्ध होता है। और वह शिवतुल्य हो जाता है!
वे जो भी बोलते हैं वह जप है।
आत्मज्ञान ही उनका दान है।
वह अंतदशक्तियों का स्वामी है और ज्ञान का कारण है।
स्वशक्ति का प्रचय अर्थात् सतत विलास ही इसका विश्व है। और वह स्वेच्छ से स्थिति और लय करता है।
सुख—दुख बाह्य वृत्तियां है—ऐसा सतत जानता है 1 और उनसे विमुक्त—वह केवली हो जाता है।
उस कैवल्य अवस्था में आरूढ़ हुए योगी का अभिलाषा—क्षय के कारण जन्म—मरण का पूर्ण क्षय हो जाता है।
ऐसा भूत—कंचुकी विमुक्त पुरुष परम शिवरूप ही होता है।
ओम भगवान श्री शिव को यह अर्पित हो।