कर्णजीवातुभूतम् (कीमिया-ए-इश्क़)

-1- विरञ्चिना विरचिता सुन्दरि! त्वं न सुन्दरी।तथा, यथा मनस्तूल्या मया त्वं सुन्दरीकृता॥ हे सुन्दरी,ब्रह्मा ने भी तुम्हें उतना सुन्दर नहीं बनाया हैजितना कि मैंने अपने मन की कूँची से सँवारकरतुम्हें दर्शनीय बना दिया है -2- त्वं मनोमुकुरे यावन्मयाकल्प्य विलोकिता।न काचदर्पणे तावत् त्वयात्मापि निरीक्षितः॥ खूब सजा सँवार करहृदय के दर्पण मेंजितना ध्यान से मैंने तुम्हें निहारा […]

कर्णजीवातुभूतम् (कीमिया-ए-इश्क़)

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