अमरूशतकम्-८

अनेक नायिकाओं से रमण करनें वाले नायक के व्यवहार से खिन्न नायिका से चतुर सखी कहती है-

“हे कातरे,बाहर से भोली किन्तु भीतर से कुटिल नारियाँ तुम्हारे प्रिय पर डाका डाल ही देती हैं,वह रोकनें पर भी नहीं मानती इसलिये तुम व्यर्थ क्यों जल भुन रही हो,क्यों रो रही हो? ऐसा करके तो तुम उन्हीं के मन का कर रही हो। अत: ऐसा मत करो बल्कि वैसे मनोहर, विलासी ,युवा और सह्रदय पति को उससे छीनकर परूष कठिन तथा प्रिय वचनों से अपने अधीन बना लो”

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