दंपत्योर्निशि जल्पतोर्गृहशुकेनाकर्णितं यद्वच-
स्तत्प्रातर्गुरूसंनिधौ निगदत: श्रुत्वैव तारं वधू:।
कर्णालम्बितपद्मरागशकलं विन्यस्य चन्च्वा: पुरा
ब्रीडार्ता प्रकरोति दाडिमफलव्याजेन वाग्बन्धनम्।।
सखी सखी से कह रही है-
रात में दम्पति नें जो बातें की थीं उसे घर के तोते नें सुन लिया था। उन्हीं बातों को प्रात: काल उसनें गुरूजनों के सामनें बोल बोल कर सुनाना प्रारंभ किया। इसे सुन कर लाज की मारी बहू अपनें कान में लटकते हुये लालमणि के दानों को अनार के दानों के रूप में उसकी चोंच में दे दे कर इसी बहानें उसका बोलना रोक रही है।।।१६।।