अमरूशतकम्-१५

कखमपि सखि! क्रीडाकोपाद्व्रजेति मयोदिते

कठिनहृदय: शय्यां त्यक्त्वाबलाद् गतएव स:।

इति सरभसं ध्वस्तप्रेम्णि व्यपेतघृणे स्पृहां

पुनरपि हतव्रीडं चेत: करोति करोति किम्।।१५।।

प्रणयकलहान्तरिता नायिका सखी से कहता है–

सखि,मैनें तो प्रणयकोप में ही रोकते रोकते उससे यह कह दिया कि तुम चले जाओ और वह कठिन हृदय न चाहते हुये भी शय्या छोड़ कर चल दिया।इस प्रकार बिना सोचे समझे प्रेमक्रीड़ा को नष्ट कर देनें वाले तथा मेरे प्रति उपेक्षा प्रदर्शित करनें वाले उस निष्ठुर को भी सदि मेरा निर्लज्ज मन चाहता है तो फिर तुम्हीं कहो कि अब मैं क्या करूँ?

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