सखी सखी से कह रही है-
“हे प्रिय,एक पहर बीतनें पर या दोपहर या तीसरे पहर या सारा दिन बीत जानें पर सायंकाल यहाँ लौट आओगे न!,इस प्रकार आँसू तथा उसासों से भरी वाणी कहकर वह बाला सौ दिन की लम्बी राह पर जानें वाले प्रिय को रोक रही है ।”
प्रहरविरतौ मध्ये वाह्नस्ततोऽपि परेण या
किमुत सकले याते वाह्नि प्रिय! त्वमिहैष्यसि।
इति दिनशतप्राप्यं देशं प्रियस्य यियासतो
हरति गमनं बालालापै: सबाष्पगलज्जलै: ।।१२।।