माननी नायिका की सखी नायक से कह रही है-
“तुमनें ही इसे इतना अधिक प्यार दिया(तुम यह न समझना कि यह प्यार पानें के लिये ऐसा कर रही है),तुमनें ही बहुत दिनों से इसका लालन भी किया किन्तु आज दैवात तुमनें ही(अनजाने)इसके लिये पहला अप्रिय कार्य भी कर दिया ।इसका यह क्रोध दुस्सह है,यह तो स्पष्ट ही है कि यह सान्त्वना की वाणी से शांन्त नहीं हो सकता ।अत: हे निष्ठुर ! मेरी सखी को फूट फूट कर रो लेनें दो(अन्यथा शोक से उसका हृदय ही फट जायेगा)फिर जैसा उचित समझना वैसा करना ।”